तरावीह पारा-5
पारा-5 सूरह अन-निसा के मध्य भाग की शिक्षाओं का संग्रह है।
बदकारी (बुराई) से दूर रहो। निकाह (विवाह) का पाकीज़ा (पवित्र) रास्ता इख़्तियार (अपनाओ) करो। अगर किसी मुस्लिम आज़ाद (स्वतंत्र) औरत से निकाह की ताक़त (क्षमता) न रखते हो तो किसी मुस्लिम बांदी (दासी) से निकाह कर लो लेकिन कभी बेहयाई (बेशर्मी) के क़रीब न जाओ।
आपस में एक-दूसरे का माल नाजायज़ (अवैध) तरीक़ों से मत खाओ। आपसी रज़ामंदी (सहमति) वाली तिजारत (व्यापार) को बढ़ावा दो। एक-दूसरे की जान का सम्मान करो।
औरतों को चाहिए कि वह नेक और इताअत-गुज़ार (आज्ञाकारी) हों और मर्दों की ग़ैर मौजूदगी (अनुपस्थिति) में अपनी इज़्ज़त व आबरू (सम्मान) की हिफ़ाज़त (रक्षा) करने वाली बनें।
बीवी का रवैया (व्यवहार) सही न हो तो उसकी इस्लाह (सुधार) की मुनासिब (उचित) तदबीरें (उपाय) इख़्तियार करो। शौहर – बीवी में अनबन (अनबन) बढ़ जाए तो दूसरे लोग भी सूरतेहाल (स्थिति) को बेहतर बनाने में मदद करें।
अल्लाह की बंदगी (इबादत) करो, उसके साथ किसी को शरीक (साझेदार) न ठहराओ। माँ बाप के साथ अच्छा बर्ताव (व्यवहार) करो, रिश्तेदारों, यतीमों (अनाथों), मिसकीनों (गरीबों), रिश्तेदार पड़ोसियों, अजनबी (अजनबी) पड़ोसियों, बग़ल के साथियों, मुसाफ़िरों (यात्रियों) और जो तुम्हारी मिल्कियत (संपत्ति) में हों उनके साथ अच्छे से अच्छा व्यवहार करो।
अल्लाह से सरकशी (बगावत) न करो। न ख़ुद हक़ (सत्य) बात छिपाओ और न दूसरों को हक़ बात छिपाने पर उकसाओ। अल्लाह ने तुम्हें जो इल्म (ज्ञान) दिया है उसका ऐलान (प्रचार) करो। कुफ़्र (अविश्वास) और नाशुक्री (अकृतज्ञता) का तरीक़ा मत इख़्तियार करो। लोगों को दिखाने के लिए न ख़र्च करो।
नशा मत करो और नमाज़ के लिए पूरे होश व हवास (सचेत) के साथ आओ। ग़ुस्ल (पूर्ण स्नान) वाजिब (अनिवार्य) हो जाए तो ग़ुस्ल करो और अगर बीमार हो या पानी उपलब्ध नहीं हो तो तयम्मुम (मिट्टी से शुद्धि) कर लो।
यहूदियों और ईसाईयों की तरह दीन में तहरीफ़ (परिवर्तन) का ख़याल दिल में न लाओ। न दीन से बेज़ारी (घृणा) का इज़हार (प्रकट) करो न दीन का मज़ाक़ उड़ाओ। इताअत (आज्ञापालन) और फ़रमाँबरदारी (आज्ञाकारिता) का सच्चा नमूना बन जाओ।
शिर्क (बहुदेववाद) बहुत बड़ा गुनाह है। और सबसे बड़ा शिर्क अल्लाह की भेजी हुई शरीयत (इस्लामी कानून) के मुक़ाबले में दूसरे क़ानूनों की पैरवी (अनुसरण) करना है। शिर्क को अल्लाह माफ़ नहीं करेगा। अपनी पाकीज़गी (पवित्रता) का ख़ुद दम न भरो। संजीदगी (गंभीरता) से अपना जायज़ा (आत्म-मूल्यांकन) लो कि क्या अल्लाह के यहाँ तुम्हें पाकीज़ा क़रार दिया जाएगा?
जिसका जो हक़ (अधिकार) है वह उसके हवाले (सुपुर्द) कर दो। और जब लोगों के दरमियान (बीच) फ़ैसला करो तो इंसाफ़ (न्याय) के साथ करो। अल्लाह की नसीहतों (उपदेश) की क़द्र (मूल्य) करो।
ताग़ूत (शैतानी ताकत) और ताग़ूत की शरीयत को तस्लीम (स्वीकार) न करो। अल्लाह और अल्लाह के दीन पर ईमान लाओ। इताअत (आज्ञापालन) करो अल्लाह की और इताअत करो रसूल की और उन लोगों की जो तुम में साहिब-ए-अम्र (अधिकारी) हों। फिर अगर तुम्हारे दरमियान किसी मामले में विवाद हो जाए तो उसे अल्लाह और रसूल की तरफ़ लौटा दो। अपने मामलों का फ़ैसला कराने के लिए ताग़ूत के पास मत जाओ।
अगर तुम मोमिन (ईमानवाले) हो तो अपने आपसी इख़्तिलाफ़ात (मतभेद) में रसूल का फ़ैसला मानो और रसूल जो फ़ैसला करे उस पर अपने दिलों में कोई तंगी (असंतोष) महसूस न करो, रसूल के फ़ैसले के आगे अपना सर झुका दो।
अल्लाह और रसूल की इताअत करो। अल्लाह तुम्हें उन लोगों का साथ अता (देगा) करेगा जिन पर उसने ईनाम (अनुग्रह) फ़रमाया है यानी अंबिया (नबी) और सिद्दीक़ीन (सच्चे) और शहीदों और सालेहीन (नेककार) का साथ। तुम ऐसे लोगों की रिफ़ाक़त (संगति) की तमन्ना (इच्छा) दिल में बसाओ और जिंदगी भर इसके लिए कोशिशें करते रहो।
बातिल (झूठ) से मुक़ाबले के लिए हर वक्त तैयार रहो। जब हुक्म (आदेश) हो तो निकल पड़ो और मन मत चुराओ। उन लोगों में शामिल हो जाओ जिन्होंने आखिरत के लिए दुनिया की ज़िंदगी को तज (त्याग) दिया।
तुम अल्लाह के लिए उन बेबस (लाचार) मर्दों, औरतों और बच्चों की ख़ातिर जंग करो जो कमज़ोर पाकर दबा लिए गए हैं। और अल्लाह से अपनी बस्ती के जालिमों (अत्याचारी) के ख़िलाफ़ फ़रयाद (पुकार) कर रहे हैं।
तुम्हें सिर्फ़ अल्लाह के रास्ते में जंग करनी है। जब जंग फ़र्ज़ (अनिवार्य) हो जाए तो लोगों से मत डरो, अल्लाह के फैसले पर ऐतराज़ (आपत्ति) मत करो। मौत से मत डरो, तुम मौत से कहीं नहीं भाग सकते हो। दुनिया की ज़िंदगी बहुत कम है और आख़िरत बहुत बेहतर है। आख़िरत की ख़ातिर दुनिया को क़ुरबान (बलिदान) कर देने में ही बेहतरी है।
अपनी ताक़त भलाई के लिए इस्तेमाल करो, बुराई को ताक़त न पहुँचाओ। जब कोई तुम्हें सलाम करे तो उसको उससे बेहतर तरीक़े से जवाब दो या कम से कम उसी तरह जवाब दो।
मुनाफ़िक़ों (कपटियों) को दोस्त न बनाओ, उनकी मीठी-मीठी बातों से धोखा न खाओ।
किसी मोमिन पर हाथ न उठाओ, न किसी ऐसे शख़्स पर हाथ उठाओ जिसकी क़ौम से तुम्हारा मुआहिदा (समझौता) हो। और अगर ग़लती से कोई क़त्ल हो जाए तो उसका ख़ूनबहा (रक्तमूल्य) अदा करो। ग़लती से क़त्ल हो जाने की सूरत में एक मोमिन ग़ुलाम भी आज़ाद करो। ग़ुलाम न हो तो दो महीने लगातार रोज़े रखो। जानबूझ कर किसी मोमिन को क़त्ल करने का ख़याल दिल में न लाओ, यह बहुत संगीन (गंभीर) गुनाह है जिसकी सज़ा जहन्नम है, हमेशा रहने वाली जहन्नम। अपना हाथ रोक लो और हालते जंग में भी कोई सलाम कर दे तो उसे झूठा समझकर उस पर हाथ मत उठाओ।
जब अल्लाह की राह में जान व माल पेश करने का हुक्म हो तो बैठे मत रहो, आगे बढ़ो और जब हिजरत (स्थानांतरण) का हुक्म हो तो पसोपेश (हिचकिचाहट) न करो और हिजरत के लिए निकल पड़ो।
दुश्मन की तरफ़ से हमले का ख़तरा हो, तो ऐसी सूरत में भी नमाज़ ज़रूर पढ़ो। साथ ही ऐसी तरकीब (योजना) करो कि एक गिरोह (समूह) नमाज़ पढ़े और एक गिरोह दुश्मन के सामने रहे।
अल्लाह जो समझबूझ अता करे उसकी रौशनी में अल्लाह की किताब के मुताबिक़ फ़ैसला करो। ख़यानत (धोखा) और घोटाला करने वाले और ग़लत पेशा लोगों के साथ कोई रियायत (छूट) न करो न उन के साथ हमदर्दी रखो।
कोई गुनाह कर बैठो तो फ़ौरन (तुरंत) ख़ुदा से माफ़ी माँगो। गुनाहों को अपनी ज़िंदगी की कमाई मत बनाओ। ख़ुद ग़लती या गुनाह करके दूसरे बेगुनाह के सर न थोप दो, यह बेहद संगीन हरकत है।
लोगों को सदक़ा (दान) व ख़ैरात (दान-पुण्य) और नेकी के कामों पर उभारते रहो और लोगों के बिगड़े संबंध बनाने की कोशिश करो। इन कामों के लिए सरगोशी (फुसफुसाहट) बेहतर हो तो सरगोशी करो, इसके अलावा सरगोशी और खुसुर-पुसुर (गुप्त बातें) से परहेज़ (बचना) करो।
रसूल की मुख़ालिफ़त (विरोध) करना और अहले ईमान (ईमानवालों) का तरीक़ा छोड़ कर दूसरे रास्ते इख़्तियार करना आख़िरत के लिए बहुत ख़तरनाक है, इससे ख़बरदार (सावधान) रहो। और शिर्क से बहुत दूर रहो, शिर्क एक नाक़ाबिले माफ़ी (माफ़ न होने वाला) जुर्म है।
मर्द हो या औरत, जन्नत में जाने के लिए ईमान और नेक अमल (अच्छे काम) ज़रूरी है। इसलिए अपने ईमान की हिफ़ाज़त (रक्षा) करो, बुरे कामों से बचो और अच्छे काम करते रहो, आरज़ूओं (इच्छाओं) के महल मत बनाओ। अपना रुख़ (दिशा) अल्लाह की तरफ़ करो और नेकी व तक़वा (परहेज़गारी) की ज़िंदगी बसर (बिताओ) करो। इब्राहीम जिस तरह अल्लाह की तरफ़ यकसू (समर्पित) थे वैसे ही तुम इब्राहीम के तरीके पर चलो।
यतीम बच्चियों का हक़ न मारो या उनके साथ कोई ज़्यादती (अत्याचार) न करो। कमज़ोर यतीम बच्चों के हुक़ूक़ (अधिकार) अदा करो। यतीमों के साथ इंसाफ़ करो और भलाई के कामों में आगे बढ़ो।
शौहर और बीवी में इख़्तिलाफ़ (मतभेद) हो तो आपस में सुलह (समाधान) करने में पहल करो और एहसान (कृपा) का तरीक़ा इख़्तियार करो। ख़ुदातरसी (ईश-भय) से काम लो। ख़ुदग़रज़ी (स्वार्थ) इंसान में रची-बसी है इसलिए इस बात से होशियार रहो। ऐसा कोई तरीक़ा न इख़्तियार करो कि तुम्हारी कोई बीवी मुअल्ल्क़ (अधर में लटकी) रह जाए। अलगाव की नौबत आए तो भी अल्लाह की बेपनाह (असीम) मेहरबानी से पुरउम्मीद (आशावान) रहो।
ख़ुदा के वास्ते इंसाफ़ के अलंबरदार (ध्वजवाहक) और ख़ुदा वास्ते इंसाफ़ के गवाह बनो चाहे इसकी वजह से कितना ही नुक़सान उठाना पड़े लेकिन इंसाफ़ का तरीक़ा न छोड़ो।
अल्लाह का इनकार करने वालों को अपना दोस्त न बनाओ। मुनाफ़िक़त (कपट) से अपना दामन (आंचल) बचाओ और अल्लाह का दामन थाम लो। ख़ालिस (शुद्ध) अल्लाह की इताअत को अपना तरीक़ा बना लो।
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अल्लाह के कलाम (संदेश) को दूसरों तक पहुँचाना सदक़ा-ए-जारिया (निरंतर मिलने वाला पुण्य) है। हो सकता है कि आपके एक शेयर से किसी भटके हुए को हिदायत मिल जाए या किसी का ईमान ताज़ा हो जाए।
भलाई की राह दिखाने वाले को भी उतना ही सवाब (पुण्य) मिलता है, जितना उस पर अमल करने वाले को।
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