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> इतिहास > स्वतंत्रता सेनानी > डॉ. ज़ाकिर हुसैन: भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति की प्रेरणादायक कहानी

डॉ. ज़ाकिर हुसैन: भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति की प्रेरणादायक कहानी

डॉ. ज़ाकिर हुसैन भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति, शिक्षाविद्, और स्वतंत्रता सेनानी थे। उनकी अनसुनी कहानियाँ, प्रेरक कोट्स, और नई तालीम की क्रांति की कहानी जो हर युवा को प्रेरित करेगी।
एо अहमद
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लेखकएо अहमद
Founder and Editor
मैं आफताब अहमद इस साइट पर एक लेखक हूं, मुझे विभिन्न शैलियों और विषयों पर लिखना पसंद है। मुझे ऐसा निबंध और ब्लॉग लिखना अच्छा लगता...
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Published: 06/09/2025
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12 मिनट में पढ़ें

डॉ. ज़ाकिर हुसैन का नाम भारत के इतिहास में एक चमकते सितारे की तरह दर्ज है। वह न केवल भारत के तीसरे राष्ट्रपति और पहले मुस्लिम राष्ट्रपति थे, बल्कि एक प्रख्यात शिक्षाविद्, स्वतंत्रता सेनानी, और समाज सुधारक भी थे। उनकी ज़िंदगी की कहानी हर युवा के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो मेहनत, समर्पण, और देशभक्ति की ताक़त को दर्शाती है। यह लेख उनकी ज़िंदगी के अनछुए पहलुओं, रोचक किस्सों कि कैसे एक साधारण परिवार का लड़का भारत के सर्वोच्च पद तक पहुँचा।

हाईलाइट्स
  • बचपन और शुरुआती ज़िंदगी: त्रासदी से ताक़त तक
  • स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: गांधी के सच्चे सिपाही
  • शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति: नई तालीम का सपना
  • राजनीतिक सफर: बिहार से राष्ट्रपति भवन तक
  • प्रेरणादायक कोट्स: विचार जो आज भी ज़िंदा हैं
  • पुरस्कार और सम्मान
  • FAQs: डॉ. ज़ाकिर हुसैन से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल
  • निष्कर्ष: एक ज़िंदगी, एक प्रेरणा

बचपन और शुरुआती ज़िंदगी: त्रासदी से ताक़त तक

डॉ. ज़ाकिर हुसैन का जन्म 8 फरवरी 1897 को हैदराबाद के एक समृद्ध पठान खानदान में हुआ था। उनके वालिद, फ़िदा हुसैन ख़ान, एक मशहूर वकील थे, और उनकी वालिदा, नाज़नीन बेगम, एक धार्मिक और स्नेही महिला थीं। लेकिन ज़िंदगी ने जल्द ही उन्हें कठिन इम्तिहान (परीक्षा) में डाल दिया। जब वह सिर्फ़ 10 साल के थे, उनके वालिद का इंतकाल (निधन) हो गया। इसके कुछ साल बाद, 1911 में, उनकी वालिदा भी इस दुनिया को अलविदा कह गईं। इतनी कम उम्र में अनाथ होने के बावजूद, ज़ाकिर हुसैन ने हिम्मत नहीं हारी।

उनकी शुरुआती तालीम (शिक्षा) हैदराबाद के इस्लामिया हाई स्कूल, इटावा में हुई। यहाँ से उन्होंने अपनी मेहनत और लगन से आगे बढ़ने का रास्ता बनाया। बाद में, वह अलीगढ़ के मुहम्मदन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज (जो बाद में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी बना) में पढ़े। उनकी प्रतिभा और जुनून ने उन्हें जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय तक पहुँचाया, जहाँ उन्होंने अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। इस विदेशी शिक्षा ने उनकी सोच को और व्यापक किया, और वह भारत लौटे एक नए जोश और मक़सद (उद्देश्य) के साथ।

एक अनसुना किस्सा: बचपन की जिज्ञासा

ज़ाकिर हुसैन के एक करीबी दोस्त ने बाद में बताया कि बचपन में वह किताबों में खोए रहते थे। एक बार, जब वह सिर्फ 12 साल के थे, उन्होंने अपने उस्ताद (शिक्षक) से पूछा, “क्या किताबें हमें दुनिया बदलने की ताक़त दे सकती हैं?” उनके उस्ताद ने जवाब दिया, “हाँ, बशर्ते तुम किताबों को सिर्फ़ पढ़ो नहीं, बल्कि उनके विचारों को ज़िंदगी में उतारो।” यह बात ज़ाकिर हुसैन के दिल में घर कर गई और उनकी ज़िंदगी का मक़सद बन गई।

स्वतंत्रता संग्राम में योगदान: गांधी के सच्चे सिपाही

ज़ाकिर हुसैन का दिल हमेशा अपने मुल्क (देश) के लिए धड़कता था। 1920 में, जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया और युवाओं से सरकारी संस्थानों का बहिष्कार करने की अपील की, ज़ाकिर हुसैन ने इसे दिल से क़बूल (स्वीकार) किया। उस समय वह अलीगढ़ में पढ़ रहे थे, लेकिन उन्होंने पढ़ाई छोड़कर जामिया मिल्लिया इस्लामिया की स्थापना में हिस्सा लिया। यह संस्थान राष्ट्रीय शिक्षा और स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन गया।

1926 में, सिर्फ 29 साल की उम्र में, वह जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति बने और 1948 तक इस पद पर रहे। इस दौरान, उन्होंने जामिया को आर्थिक तंगी और ब्रिटिश सरकार के दबाव के बावजूद मज़बूत किया। एक रोचक वाक़या उस समय का है, जब जामिया के पास पैसे खत्म हो गए थे। ज़ाकिर हुसैन ने अपने निजी गहने और किताबें बेचकर संस्थान को चलाया। यह उनकी निस्वार्थ भावना और समर्पण को दर्शाता है।

एक मार्मिक किस्सा: बच्चों के लिए त्याग

1933 में, जब वह जामिया में प्राइमरी स्कूल के बच्चों को मिठाइयाँ बाँट रहे थे, एक चपरासी ने उनके कान में फुसफुसाया कि उनकी तीन साल की बेटी रेहाना गंभीर रूप से बीमार है। लेकिन ज़ाकिर हुसैन ने बच्चों की खुशी को पहले रखा और मिठाइयाँ बाँटना जारी रखा। बाद में, उनकी पत्नी शाहजहाँ बेगम ने बताया कि कई रातों तक उनका तकिया आंसुओं से गीला रहता था, क्योंकि वह अपनी बेटी की हालत को लेकर चिंतित थे। यह वाक़या उनकी ज़िम्मेदारी और इंसानियत की मिसाल है।

शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति: नई तालीम का सपना

डॉ. ज़ाकिर हुसैन का मानना था कि तालीम (शिक्षा) सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि ज़िंदगी जीने की कला है। 1937 में, महात्मा गांधी के निमंत्रण पर वह प्राथमिक शिक्षा के राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष बने। उन्होंने “नई तालीम” की नींव रखी, जो गांधीवादी दर्शन पर आधारित थी। इस नीति का मक़सद था बच्चों को आत्मनिर्भर बनाना, उनके हाथ और दिमाग को जोड़ना, और शिक्षा को व्यावहारिक बनाना।

उन्होंने कहा था, “शिक्षा ख़ुद में साध्य (उद्देश्य) नहीं है, बल्कि ज़िंदगी जीने की कला है।” इस विचार ने शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति ला दी। नई तालीम ने बच्चों को सिर्फ़ किताबें पढ़ने के बजाय खेती, हस्तशिल्प, और सामाजिक ज़िम्मेदारी सिखाने पर ज़ोर दिया। आज भी, उनकी यह सोच शिक्षा नीतियों में प्रासंगिक है।

एक प्रेरक वाक़या: जामिया में बच्चों के साथ

एक बार, जामिया के एक छात्र ने ज़ाकिर हुसैन से पूछा, “आप इतने व्यस्त होने के बावजूद बच्चों के साथ इतना वक्त क्यों बिताते हैं?” उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “क्योंकि बच्चे ही हमारे मुल्क का मुस्तकबिल (भविष्य) हैं। अगर मैं उन्हें वक्त नहीं दूँगा, तो मैं अपने मुल्क को क्या दूँगा?” यह जवाब उनकी दूरदर्शिता और बच्चों के प्रति उनके प्यार को दर्शाता है।

राजनीतिक सफर: बिहार से राष्ट्रपति भवन तक

ज़ाकिर हुसैन का राजनीतिक सफर भी उनकी ज़िंदगी का एक अहम हिस्सा है। 1957 में, वह बिहार के गवर्नर बने। इस दौरान, उन्होंने शिक्षा और सामाजिक सुधारों पर ज़ोर दिया। 1962 में, वह भारत के उपराष्ट्रपति चुने गए, और 1967 में, वह कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के रूप में भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने। वह पहले मुस्लिम राष्ट्रपति थे, और उनका यह सफर देश की एकता और समावेशिता का प्रतीक था।

उनका कार्यकाल 13 मई, 1967 से 3 मई, 1969 तक रहा। दुर्भाग्यवश, 3 मई, 1969 को उनका इंतकाल हो गया, जिससे वह भारत के पहले राष्ट्रपति बने जिनका निधन कार्यकाल के दौरान हुआ। उनकी मृत्यु ने पूरे देश को शोक में डुबो दिया।

एक रोचक किस्सा: राष्ट्रपति भवन में सादगी

राष्ट्रपति बनने के बाद भी ज़ाकिर हुसैन अपनी सादगी के लिए जाने जाते थे। एक बार, राष्ट्रपति भवन में एक मेहमान ने उनसे पूछा, “आप इतने बड़े पद पर होने के बावजूद इतने सादा क्यों हैं?” उन्होंने जवाब दिया, “मैंने हमेशा मुल्क की ख़िदमत (सेवा) को अपनी शान समझा, न कि इस पद को।” यह जवाब उनकी नम्रता और देशभक्ति को दर्शाता है।

प्रेरणादायक कोट्स: विचार जो आज भी ज़िंदा हैं

डॉ. ज़ाकिर हुसैन के विचार आज भी युवाओं को प्रेरित करते हैं। यहाँ उनके कुछ मशहूर कोट्स हैं:

  1. “सच्ची तालीम वह है जो इंसान को इंसान बनाए।”
  2. “ज़िंदगी का मक़सद सिर्फ़ जीना नहीं, बल्कि दूसरों के लिए जीना है।”
  3. “जो समाज शिक्षित नहीं, वह कभी आज़ाद नहीं हो सकता।”

ये कोट्स न केवल प्रेरणादायक हैं, बल्कि यह भी बताते हैं कि ज़ाकिर हुसैन की सोच कितनी गहरी और दूरदर्शी थी।

पुरस्कार और सम्मान

डॉ. ज़ाकिर हुसैन को उनके योगदान के लिए कई सम्मानों से नवाज़ा गया। 1963 में, उन्हें भारत रत्न, भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, प्रदान किया गया। इसके अलावा, उन्हें शिक्षा और सामाजिक कार्यों के लिए कई अन्य पुरस्कार भी मिले। उनकी विरासत आज भी जामिया मिल्लिया इस्लामिया और भारतीय शिक्षा प्रणाली में जीवित है।

FAQs: डॉ. ज़ाकिर हुसैन से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल

प्रश्न: डॉ. ज़ाकिर हुसैन कौन थे?

उत्तर: डॉ. ज़ाकिर हुसैन भारत के तीसरे राष्ट्रपति (1967-1969) और पहले मुस्लिम राष्ट्रपति थे। वह एक मशहूर शिक्षाविद्, स्वतंत्रता सेनानी, और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के संस्थापकों में से एक थे।

प्रश्न: उनका जन्म कब और कहाँ हुआ था?

उत्तर: उनका जन्म 8 फरवरी, 1897 को हैदराबाद, तेलंगाना में एक पठान परिवार में हुआ था।

प्रश्न: उनकी शिक्षा कहाँ से पूरी हुई?

उत्तर: उन्होंने इस्लामिया हाई स्कूल, इटावा, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, और बर्लिन विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की।

प्रश्न: जामिया मिल्लिया इस्लामिया में उनका क्या योगदान था?

उत्तर: उन्होंने 1920 में जामिया की स्थापना में हिस्सा लिया और 1926 से 1948 तक इसके कुलपति रहे, जिससे यह राष्ट्रीय शिक्षा का केंद्र बना।

प्रश्न: नई तालीम क्या थी?

उत्तर: नई तालीम एक गांधीवादी शिक्षा नीति थी, जिसे ज़ाकिर हुसैन ने 1937 में तैयार किया। यह आत्मनिर्भरता और व्यावहारिक शिक्षा पर केंद्रित थी।

प्रश्न: वह भारत के राष्ट्रपति कब बने?

उत्तर: वह 13 मई, 1967 को भारत के तीसरे राष्ट्रपति बने और 3 मई, 1969 तक इस पद पर रहे।

प्रश्न: उनकी मृत्यु कब और कैसे हुई?

उत्तर: उनका इंतकाल 3 मई, 1969 को कार्यकाल के दौरान हुआ। वह भारत के पहले राष्ट्रपति थे, जिनका निधन कार्यकाल में हुआ।

प्रश्न: क्या वह पहले मुस्लिम राष्ट्रपति थे?

उत्तर: हाँ, वह भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति थे, जिन्होंने देश की एकता और समावेशिता को मज़बूत किया।

प्रश्न: उनके कुछ प्रसिद्ध कोट्स क्या हैं?

उत्तर: उनके कोट्स में शामिल हैं: “सच्ची तालीम वह है जो इंसान को इंसान बनाए” और “ज़िंदगी का मक़सद दूसरों के लिए जीना है।”

प्रश्न: उन्हें किन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया?

उत्तर: उन्हें 1963 में भारत रत्न, भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, और कई अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

निष्कर्ष: एक ज़िंदगी, एक प्रेरणा

डॉ. ज़ाकिर हुसैन की ज़िंदगी हमें सिखाती है कि मुश्किल हालात में भी मेहनत, समर्पण, और सही मक़सद के साथ कुछ भी हासिल किया जा सकता है। उनकी कहानी न केवल युवाओं को प्रेरित करती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि शिक्षा और देशभक्ति के ज़रिए हम अपने समाज और मुल्क को बेहतर बना सकते हैं। उनकी सादगी, त्याग, और दूरदर्शिता आज भी हमें रास्ता दिखाती है।

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एо अहमद
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