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> इतिहास > हज़रत खालिद बिन वलीद को जानिये जिन्होंने अपने समय के सुपर पावर रोमन साम्राज्य और पर्शियन साम्राज्य को धूल चटाई।

हज़रत खालिद बिन वलीद को जानिये जिन्होंने अपने समय के सुपर पावर रोमन साम्राज्य और पर्शियन साम्राज्य को धूल चटाई।

एо अहमद
एо अहमद
एо अहमद
लेखकएо अहमद
Founder and Editor
मैं आफताब अहमद इस साइट पर एक लेखक हूं, मुझे विभिन्न शैलियों और विषयों पर लिखना पसंद है। मुझे ऐसा निबंध और ब्लॉग लिखना अच्छा लगता...
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Published: 04/02/2024
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6 मिनट में पढ़ें

खालिद बिन वलीद ( Hazrat Khalid Bin Waleed ) एक ऐसे मुजाहिद का नाम है जिनके बारे में जानकर लोग आश्चर्यचकित हो जाते हैं और इस्लाम के दुश्मन यह सोचकर भयभीत हो जाते हैं कि कहीं फिर से कोई खालिद बिन वलीद न पैदा हो जाए इसलिए ये लोग चाहते हैं की खालिद बिन वलीद की इतिहास को बंद कर के रखा जाए, इन्हे न सुनाया जाए, न इन के इतिहास का मुताला किया जाए, न इनकी सीरत (जीवनी) पढ़ी जाए, क्यूं कि प्रभावशाली लोगों की सीरत (जीवनी) और इतिहास पढ़ने से उसका असर जरूर आता है।

खालिद बिन वलीद रज़ी अल्लाह ताला अन्हु वो सहाबी हैं जिनको अल्लाह के रसूल ﷺ ने सैफुल्लाह कहा (यानी अल्लाह की तलवार)। इन्होने अपने जिंदगी में 125 जंगों में शिरकत की और आप को जान के हैरानी होगी की 125 जांगों में से एक में भी इन्हे शिकस्त नही हुई।

हाईलाइट्स
  • खालिद बिन वलीद कौन थे?
  • इस्लाम से पहले की ज़िन्दगी-
  • बैजनटाइन और सस्सविद साम्राज्यों को कई जंगो में रौंदा-
  • सेना की सेवा समाप्ति के बाद-

खालिद बिन वलीद कौन थे?

अल्लाह की तलवार हज़रत खालिद बिन वलीद रज़ी अल्लाह अन्हु का खानदान, खानदाने कुरैश के बहुत ही नामवर लोगों में से हैं उन की “वालिदा हज़रत बीबी लुबाबा सुगरा उम्मुल मोमिनीन” (राजियाल्लाहो अन्हा), “हज़रत बीबी मैमूना” (राजियाल्लाहो अन्हा) की बहन थीं। हज़रत खालिद बिन वलीद बहादुरी और फोजी सलाहियत तदादी जंग के ऐतबार से तमाम सहाबा-ए-किराम में एक खुसूसी इम्तियाज़ रखते हैं। इस्लाम कबूल करने से पहले उन की और उन के बाप वलीद की इस्लाम दुश्मनी मश्हूर थी। जंगे बद्र और जंगे उहुद की लड़ाइयों में यह कुफ़्फ़ार के साथ रहे और उन से मुसलमानों को बहुत ज़्यादा जानी नुकसान पहुँचा मगर अचानक उन के दिल में इस्लाम की सच्चाई का ऐसा सूरज निकल गया कि सन् 7 हिजरी में यह खुद बखुद मक्का से मदीना जाकर दरबारे रिसालत में हाज़िर हो गए और दामने इस्लाम में आगए।

इस्लाम से पहले की ज़िन्दगी-

हज़रत खालिद बिन वलीद रज़ी अल्लाह ताला अन्हु जो जांबाज़ी तथा रणनीतिक पैंतरेबाज़ी एवम् होशियारी के लिए विख्यात हैं का जन्म सन् 592 ईस्वी में अरब के एक नामवर परिवार में हुआ था।

खालिद बिन वलीद रज़ी अल्लाह ताला अन्हु ने जब तक इस्लाम मज़हब स्वीकार नही किया था तब तक इस्लाम के कट्टर शत्रु थे लेकीन 628 ईस्वी में इन्होंने अल्लाह के रसूल ﷺ से प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार कर लिया और मुत्तह की लड़ाई में शामिल हुए इस रोज़ सभी अमीर के शहीद हो जाने पर, अमीर न होने के कारण आप को युद्ध के बीच में ही अमीर बना दिया गया। इस रोज़ आपने प्रचण्ड युद्ध किया जिसका उदाहरण आज तक नहीं देखा गया और सुबह से शाम तक आपके हाथ से 9 तलवारें टूट गईं और हार रही इस्लामी सेना को बचाया और विशाल रोमन सेना में दहशत भर दिया।

बैजनटाइन और सस्सविद साम्राज्यों को कई जंगो में रौंदा-

खालिद बिन वलीद इस्लामी लश्कर के अज़ीम सिपहसालार रहे हैं। उस ज़माने की दो सुपर पावर रोमन साम्राज्य ( क़ैसर-हरक्युलिस ) और पर्सिया साम्राज्य ( क़िसरा-उर्दशेर ) की अज़ीम फौजों को जिन्होंने धूल चटाई और दोनों महान साम्राज्य को अल्लाह के फ़ज़ल से परखच्चे उड़ा दिये थे।

खालिद बिन वलीद रज़ी अल्लाह ताला अन्हु हर जंग में कामयाब हुए। उन्होंने एक तरफ शक्तिशाली रोमन साम्राज्य (बैजनटाइन) को यूरोप तक सीमित कर दिया वही फारस (इरान) में मौजूद शक्तिशाली सस्सविद हुकुमत का तो अस्तित्व ही मिट गया।

एक बात गौर करने वाली है कि अरबो के सैनिको की संख्या दोनों साम्राज्य के सैनिको से जंग में बहुत कम होती थी लेकिन खालिद बिन वलीद ने अपने रणनीति कौशल, बहादुरी और जांबाज़ी के बल पर हर जंग में दुश्मन को शिकस्त दी।

इसी बहादुरी और शुजाअत को खिराजे तहसीन पेश करते हुए मुहम्मद साहब ﷺ ने हज़रत खालिद बिन वलीद को “सैफुल्लाह” के खिताब से नवाजा।

सेना की सेवा समाप्ति के बाद-

इस्लामी जंगों और लड़ाईयों पर चर्चा किया जाये तो खालिद बिन वलीद का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। क्योंकि हज़रत खालिद बिन वलीद की हर जंग में जांबाज़ी, रणनीतिक पैंतरेबाज़ी और होशियारी भरी होती थी जिससे दुश्मन सेना के छक्के छुट जाते थे। हज़रत खालिद बिन वलीद दुनिया के एकमात्र ऐसे कमांडर है जिन्होने अपने जीवन में एक भी जंग या लड़ाई नही हारी।

तक़रीबन सवा सौ जंगों लड़ाईयों में विजय फातेह रहने वाला ये फ़ौजी जनरल कमांडर ख़ालिद बिन वलीद रज़ी अल्लाह अन्हु सेफुल्लाह बिस्तर पर अपनी मौत का इंतिज़ार करते हुए अक्सर कहा करते थे कि मेरे जिस्म का कोई हिस्सा ऐसा नहीं जहां जखम ना लगा हो मगर फिर भी मुझे जंगी मैदान में शहीद होना नसीब नहीं हुआ। आज भी जंगी बहादुरों की शान होती है जंगी मैदान में शहीद हो जाना । बहादुर सिपाही के लिये बिस्तर की मौत आज भी बदकिस्मती होती है। जवाब में दोस्त कहते भाई तुम अल्लाह की तलवार थे जो कभी नहीं हार सकती थी, अगर तुम हार जाते तो दुश्मन कहते कि अल्लाह की तलवार टूट गई।

अल्लाह की तलवार के नाम से मशहूर सहाबी हज़रत खालिद बिन वलीद रज़ी अल्लाह अन्हु ने सन् 21 हिजरी में चन्द दिन बीमार रह कर होम्स (सीरिया) में वफात पाई। आपको होम्स में ही दफनाया गया था, उस स्थान पर आपके नाम से एक मस्जिद भी मौजूद है।

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एо अहमद
लेखकएо अहमद
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मैं आफताब अहमद इस साइट पर एक लेखक हूं, मुझे विभिन्न शैलियों और विषयों पर लिखना पसंद है। मुझे ऐसा निबंध और ब्लॉग लिखना अच्छा लगता है जो मेरे पाठकों को चिंतन और प्रेरणा देती हैं।
1 कमेंट 1 कमेंट
  • Action BoyAction Boy says:

    Bahut achcha bhai

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