भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में जब भी चंपारण सत्याग्रह (1917) का ज़िक्र आता है, तो हमारा ध्यान महात्मा गांधी, राजकुमार शुक्ल या बाबू राजेंद्र प्रसाद की ओर जाता है। लेकिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसा नाम भी दर्ज है, जिसने गांधीजी के चंपारण आने से बहुत पहले ही अपने तीखे लेखों से नीलहे गोरों (ब्रिटिश नील उत्पादकों) की सत्ता को हिला कर रख दिया था। वह नाम है—पीर मुहम्मद मूनिस।
30 मई, 1882 में बेतिया शहर के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे पीर मुहम्मद मूनिस को दुनिया ‘क़लम के सत्याग्रही’ के नाम से जानती है। वे स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय क्रांतिकारी, प्रसिद्ध पत्रकार और साहित्यकार थे। चम्पारण सत्याग्रह की पृष्ठभूमि तैयार करने व गांधी जी को चम्पारण लाने में उनकी अविस्मरणीय भूमिका रही, लेकिन विडंबना यह है कि देश क़लम के इस सत्याग्रही को आज पूरी तरह से भूल चुका है।
1. चंपारण की आवाज़: जब क़लम बनी तलवार
मूनिस जी पेशे से शिक्षक थे, लेकिन उनका दिल देश की आज़ादी और किसानों की दुर्दशा को बदलने के लिए धड़कता था। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में चंपारण के किसान ‘तीनकठिया व्यवस्था’ के तहत जबरन नील की खेती करने के लिए मजबूर थे। अंग्रेज़ों के ज़ुल्म चरम पर थे। ऐसे खौफनाक दौर में मूनिस जी ने हथियार उठाने के बजाय अपनी ‘क़लम’ को हथियार बनाया और किसानों की पीड़ा को शब्दों में पिरोकर देश के सामने रखना शुरू किया।
2. ‘प्रताप’ और गणेश शंकर विद्यार्थी से नाता
मूनिस जी के क्रांतिकारी लेखों को सबसे बड़ा मंच मिला कानपुर से निकलने वाले मशहूर अखबार ‘प्रताप’ में, जिसके संपादक महान स्वतंत्रता सेनानी गणेश शंकर विद्यार्थी थे।
मूनिस जी ने ‘प्रताप’ में छद्म नामों (जैसे- चंपारण का एक रैयत) से कई लेख लिखे ताकि ब्रिटिश सरकार उन्हें आसानी से पकड़ न सके। उनके लेखों के शीर्षक ही इतने तीखे होते थे कि ब्रिटिश हुक्मरानों की नींद उड़ जाती थी, जैसे— ‘चंपारण में अंधेर’ और ‘चंपारण में प्रजा पर अत्याचार’। इन लेखों ने देश के बड़े नेताओं का ध्यान चंपारण की ओर खींचा।
3. गांधीजी को चंपारण लाने के मुख्य सूत्रधार
यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि राजकुमार शुक्ल को महात्मा गांधी से मिलाने और उन्हें चंपारण की जमीनी हकीकत से अवगत कराने के पीछे जो बौद्धिक और वैचारिक पृष्ठभूमि थी, उसे तैयार करने में पीर मुहम्मद मूनिस की बहुत बड़ी भूमिका थी। उन्होंने अख़बारों के माध्यम से चंपारण के ज़ुल्मों की जो कड़ियां जोड़ी थीं, उसी ने गांधीजी को बिहार आने के लिए प्रेरित किया। जब 1917 में गांधीजी चंपारण पहुंचे, तो मूनिस जी उनके मुख्य रणनीतिकारों और सहयोगियों में से एक थे।
4. सांप्रदायिक सौहार्द के प्रतीक और हिंदी प्रेमी
पीर मुहम्मद मूनिस केवल एक पत्रकार या स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं थे, बल्कि वह सांप्रदायिक सौहार्द की जीती-जागती मिसाल और खड़ी बोली के अनन्य साधक थे।
- हिंदी के अनन्य सेवक: एक मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के बावजूद उन्हें हिंदी भाषा से अगाध प्रेम था। वह ‘बिहार प्रांतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन’ के संस्थापकों में से एक थे।
- गंगा-जमुनी तहज़ीब: उनका मानना था कि आज़ादी की लड़ाई हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना अधूरी है। उन्होंने अपने जीवन के आखिरी समय तक समाज को जोड़ने का काम किया।
5. दमन, कड़ा संघर्ष और आज की विडंबना
ब्रिटिश सरकार को एक शिक्षक और पत्रकार की यह बेबाकी रास नहीं आई। उन्हें सरकारी नौकरी से निकाल दिया गया, उनके घर की कुर्की की गई और उन्हें कई बार जेल में डालकर अमानवीय यातनाएं दी गईं। गरीबी और तंगहाली के बावजूद उन्होंने कभी अंग्रेज़ों के सामने घुटने नहीं टेके।
लेकिन सबसे बड़ा दर्द यह है कि जिस महापुरुष ने अपनी लेखनी और जीवन देश के नाम कर दिया, उसे आज के इतिहास और समाज ने हाशिए पर धकेल दिया है।
निष्कर्ष: इतिहास के झरोखे से एक गुमनाम नायक
क़लम की नोक पर जिसने सच को ज़िंदा रखा,
वो पीर मुहम्मद मूनिस था, जो ज़ुल्म के आगे कभी न झुका।
आज जब हम आज़ाद भारत में सांस ले रहे हैं, तो हमें पीर मुहम्मद मूनिस जैसे ‘क़लम के सत्याग्रहियों’ को फिर से याद करने और उन्हें इतिहास में उनका सही स्थान दिलाने की ज़रूरत है। आज उनके जन्मदिन (30 मई) के अवसर पर यह संकल्प लेना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम देश के इस महान स्वतंत्रता सेनानी की विरासत को भूलने नहीं देंगे।
