तरावीह पारा-2
2- सूरह अल-बक़रा का दूसरा हिस्सा (आयत 142 से 252 तक)
अल्लाह ने अपनी नेमत (ईश्वर का उपहार/वरदान) को मुकम्मल (पूरा) किया और तुम्हें हक़ीक़ी (असली/सच्चे) क़िबला से जोड़ दिया, इस क़िबले की अहमियत को समझो और अपने आप को इस से अच्छी तरह जोड़े रखो। अल्लाह ने तुम्हें एक बेहतरीन उम्मत (समुदाय/अनुयायियों का समूह) बनाया है, तुम्हें लोगों पर गवाह मुक़र्रर (तय/नियुक्त) किया है, तुम शहादत-ए-हक़ (सत्य की गवाही) का फ़रीज़ा (कर्तव्य) अंजाम (पूरा करना) देते रहो।
हक़ीक़ी क़िबला तुम्हें अता (प्रदान) कर दिया गया है, अब तुम किसी तरद्दुद (दुविधा/परेशानी) का शिकार मत रहो, यकसू (एकाग्र/एक मन) होकर ख़ैर (भलाई) और भलाई के कामों की तरफ़ दौड़ पड़ो।
अल्लाह को याद रखो, अल्लाह तुम्हें याद रखेगा, अल्लाह का शुक्र अदा करो, सब्र और नमाज़ के ज़रिए (माध्यम) से अल्लाह से मदद मांगो।
अल्लाह तुम्हें आज़मायेगा (परीक्षा लेगा) तरह-तरह की आज़माइशों (परीक्षाओं) से, तुम सब्र का दामन थामे (पकड़े/अपनाए) रखो। हमेशा याद रखो कि तुम अल्लाह के बंदे हो और अल्लाह की तरफ़ ही पलटकर जाना है।
अल्लाह की निशानियों (संकेतों/प्रतीकों) पर गौर करो, अल्लाह से मुहब्बत करो, लोग अपने माबूदों (जिनकी पूजा की जाती है) से जितनी मुहब्बत करते हैं, उससे कहीं ज़्यादा तुम अल्लाह से मुहब्बत करो।
अल्लाह ने ज़मीन में हलाल (वैध/जायज़) और पाकीज़ा (शुद्ध/पवित्र) रिज़्क़ (आजीविका/भोजन) का इंतिज़ाम तुम्हारे लिए किया है, खूब खाओ-पियो और शैतान के नक़्श-ए-क़दम (पदचिह्नों/रास्ते) पर मत चलो। वह बुराई और बेहयाई (निर्लज्जता) का रास्ता दिखाता है। तुम उसके रास्ते से दूर रहो, अगर बाप-दादा का रास्ता कुरआन के ख़िलाफ़ (विरुद्ध) हो तो उस रास्ते को भी छोड़ दो।
अल्लाह ने पाकीज़ा चीजें दी हैं, उन्हें खाओ और अल्लाह का शुक्र अदा करो, हराम (वर्जित/नाजायज़) चीज़ों से बचो, याद रखो मुर्दार (मरा हुआ जानवर), खून, सूअर और ग़ैरुल्लाह (अल्लाह के सिवा कोई और) के नाम का ज़बीहा (वध किया हुआ पशु) हराम है और सब से ज़्यादा हराम तो अल्लाह की किताब को छिपाना और उसकी ग़लत तावीलें (व्याख्याएं) करके दौलत कमाना है।
अगर तुम्हें वफ़ादारी के ऊँचे स्थान पर पहुंचना है तो ईमान लाओ अल्लाह पर, आख़िरत (परलोक/मृत्यु के बाद का जीवन) के दिन पर, फ़रिश्तों, किताबों और रसूलों पर। अपना पसंदीदा माल ख़र्च करो रिश्तेदारों पर, यतीमों (अनाथों), बेघर वालों और जरूरतमंदों और गुलामों को आज़ाद कराने पर। नमाज़ क़ायम (स्थापित) करो, ज़कात दो और जो वादा करो उसे पूरा करो। कैसी ही परेशानी और मुसीबत हो सब्र करो।
मक़तूल (जो क़त्ल हुआ हो) की दियत (ख़ूनबहा/जुर्माना) के मामले में बराबरी के उसूल (सिद्धांत) पर क़ायम रहो, ज़्यादती (अन्याय/अधिकता) मत करो, माफ़ी व दरगुज़र (अनदेखा करना/क्षमा) का रास्ता भी खुला रखो और जो हक़ वाजिब (उचित/अनिवार्य) है उसकी अदायगी (भुगतान) बेहतर तरीके से करो।
वसीयत का एहतिमाम (प्रबंध/इंतजाम) करो, किसी की वसीयत में गड़बड़ी न करो और अगर वसीयत करने वाला ज़्यादती या हक़ मारने का रास्ता इख़्तियार (चुनना/अपनाना) करे तो उसे समझाओ।
रोज़ों का एहतिमाम करो और भलाई के कामों में आगे-आगे रहो। रमज़ान के महीने में कुरआन की नेमत को ख़ास तौर से याद करो। इस नेमत पर अल्लाह का शुक्र अदा करो और उसके तक़ाज़े (मांग/शर्तें) पूरे करने के लिये कोशिशें करो।
तुम्हारा रब तुम से बहुत क़रीब है। वह तुम्हारी हर दुआ सुनता है। तुम उसकी पुकार पर लब्बैक (हाज़िर हूँ/स्वीकार करना) कहो और उस पर ईमान लाओ। एक दूसरे का माल बातिल (गलत/अवैध) तरीक़े से मत खाओ, हाकिमों (अधिकारियों/शासकों) को रिश्वत दे कर दूसरे के मालों पर कब्जा मत करो।
हर काम सही तरीके से करो। परहेज़गारी (संयम/धर्मपरायणता) बेहतरीन रास्ता है उसे छोड़ कर चोर दरवाज़े मत निकालो।
उनसे जंग करो जो तुम से जंग करते हैं और ज़्यादती किसी पर मत करो। याद रखो जंग सिर्फ़ ज़ुल्म करने वालों के साथ करनी है। अल्लाह के रास्ते में ख़र्च करो, अपने आप को हलाकत (विनाश/तबाही) में मत डालो और अच्छे से अच्छा काम करो।
हज और उमरा अल्लाह के लिए करो। हज की हुरमत (पवित्रता/मर्यादा) का ख़याल करो। ज़िंदगी के सफ़र में परहेज़गारी को ज़ाद-ए-राह (यात्रा का सामान/पुण्य) बनाओ। हज करते हुए अल्लाह को ख़ूब ख़ूब याद करो, उससे मग़फ़िरत (क्षमा/मोक्ष) मांगो। तुम्हारे दिल और तुम्हारी दुआओं में दुनिया ही न बसी रहे बल्कि अल्लाह से दुनिया की अच्छी चीजें भी माँगो और आख़िरत की अच्छाई भी माँगो और जहन्नम की आग से पनाह (शरण) भी माँगो।
कट-हुज्जती (कुतर्क/बेकार की बहस) मत करो, ज़मीन में बिगाड़ मत फैलाओ, खेतों और नस्लों को तबाह हरगिज़ न करो। अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए ख़ुद को तज दो (त्याग दो/अर्पित कर दो) और सबके सब इस्लाम में दाख़िल हो जाओ, शैतान के नक़्श-ए-क़दम पर बिल्कुल न चलो।
अगर तुम्हें जन्नत में जाना है तो इसके लिए उस रास्ते की सारी तकलीफ़ों को बर्दाश्त करना होगा, इस हक़ीक़त को सदा (हमेशा) याद रखो।
ख़ैर (भलाई) के ख़ूब काम करो। माँ-बाप, रिश्तेदारों, यतीमों, मिस्कीनों (अभावग्रस्त/बेसहारा) और बेघर लोगों पर ख़ूब ख़र्च करो।
लोग तुम से जंग करें और तुम्हें दीन-ए-हक़ (सत्य धर्म) छोड़ने पर मजबूर करें तो जंग करने में पीछे न हटो। याद रखो जो सच्चा दीन मिल जाने के बाद उसे छोड़ना गवारा (सहन/स्वीकार) कर लेगा उसका आख़िरत में बहुत बुरा अंजाम (परिणाम) होगा।
शराब और जुए से दूर रहो। अल्लाह की राह में खर्च करने का ऐसा जज्बा (भावना/उत्साह) पैदा करो कि जो भी ज़रूरतों से बच रहे वह राह-ए-ख़ुदा (ईश्वर के मार्ग) में लुटा दो।
यतीमों के सिलसिले (संबंध/विषय) में जो बात उनके हक़ में बेहतर हो वही करो और उन्हें अपना भाई समझो।
रिश्ते अहल-ए-ईमान (ईमान वाले/विश्वासी) से करो, शादी-शुदा ज़िन्दगी में पाकीज़गी का एहतिमाम करो, अल्लाह पाकीज़गी का रास्ता इख़्तियार करने वालों को पसंद करता है।
अल्लाह के नाम पर ऐसी क़समें मत खाओ जो तुम्हें नेकी के कामों से रोक दें, ऐसी क़समें दिल में बसने मत दो, जल्दी से कैंसिल (रद्द) कर दो।
अपनी बीवियों से दूर रहने की क़समें न खाओ और तलाक़ की सूरत अल्लाह की हदों की पाबंदी करो। औरतें अपने गर्भ के बच्चों को न छिपाएं। मर्द औरतों को जब रखें तो भले तरीक़े से रखें और छोड़ें तो बेहतरीन अंदाज़ से छोड़ें। शौहर ने बीवी को जो दिया है वह वापस नहीं ले। बीवी फ़िदया (बदले में दी जाने वाली राशि) देकर खुला (पत्नी द्वारा ली जाने वाली तलाक़) मांगे तो शौहर रक़म लेकर खुला दे दे। शौहर औरत को जबरदस्ती रख कर उसे परेशानी में मुब्तिला (ग्रस्त/फँसा हुआ) न करे। औरतों को तलाक़ हो जाने के बाद दूसरी जगह निकाह करने से रोका नहीं जाए।
तलाक़ की सूरत में भी बच्चे की भलाई का माँ-बाप दोनों ख़याल रखें और कोई ऐसा रवैया (व्यवहार/तरीका) इख़्तियार न करें कि बच्चे को नुक़सान पहुंच जाए।
शौहर तलाक़ दे या शौहर की वफ़ात (मृत्यु) हो जाए, दोनों सूरतों में इद्दत (तलाक या मृत्यु के बाद की प्रतीक्षा अवधि) के आदाब (शिष्टाचार/तरीके) व अहकाम (नियमों) का ख़याल रखा जाए।
तलाक़ की सूरत में शौहर को चाहिए कि वह बीवी को ज्यादा से ज्यादा देकर रुख़सत (विदा) करे। इस मौक़े पर दोनों कुशादा दिली (उदारता/बड़ा दिल) और अच्छे से अच्छे बर्ताव का सबूत दें।
नमाज़ों की हिफ़ाज़त करो और अल्लाह के सामने फ़रमाँबरदार (आज्ञाकारी) बन कर खड़े हो जाओ। हालात मुश्किल और ख़तरनाक हों तब भी किसी न किसी तरह नमाज़ अदा करो।
इसकी परवाह मत करो कि तुम तादाद में कम हो। इस पर तवज्जो दो कि तुम्हारे अंदर सब्र की सिफ़त (गुण/विशेषता) कितनी है और तुम्हारा अल्लाह से संबंध कितना मज़बूत है।
👉 इस पारे की मुख्य विशेषता ‘तहवील-ए-क़िबला’ (क़िबला बदलने का हुक्म) है, जिसमें बैतुल-मक़दिस (यरूशलेम) की जगह ख़ाना-ए-काबा (मक्का) को मुसलमानों का स्थायी क़िबला बनाया गया। इसके अलावा, इसमें उम्मत-ए-मुस्लिमा की ज़िम्मेदारियों, रमज़ान के रोज़ों के फ़र्ज़ होने, हज व उमरा के नियम, और पारिवारिक व सामाजिक जीवन (जैसे वसीयत, निकाह और तलाक़) के कानूनों का विस्तार से वर्णन किया गया है।
👉 इसे बार-बार पढ़ें ताकि इसमें छिपी गहराइयाँ आपके दिल और अमल में उतर सकें। हर बार पढ़ने पर आपको दीन की एक नई समझ हासिल होगी।
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अल्लाह के कलाम (संदेश) को दूसरों तक पहुँचाना सदक़ा-ए-जारिया (निरंतर मिलने वाला पुण्य) है। हो सकता है कि आपके एक शेयर से किसी भटके हुए को हिदायत मिल जाए या किसी का ईमान ताज़ा हो जाए।
भलाई की राह दिखाने वाले को भी उतना ही सवाब (पुण्य) मिलता है, जितना उस पर अमल करने वाले को।
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