तरावीह पारा-3
सूरह अल-बक़रा का तीसरा और आखिरी हिस्सा और सूरह आले-इमरान का शुरुआती भाग शामिल है।
पिछली क़ौमों (समुदायों) ने अल्लाह की रौशन (चमकदार) किताब की नाक़दरी (अनादर) की और आपस में खून-खराबा (लड़ाई-झगड़ा) किया, तुम उनके तरीके से बचो। अल्लाह ने जो माल दिया है उसे भलाई के कामों में खर्च करो, इस से पहले कि वह दिन आ जाए जब न कोई ख़रीद व फरोख्त (खरीद-बिक्री) होगी न कोई सिफ़ारिश (मध्यस्थता) चलेगी और न कोई दोस्ती काम आएगी।
यह बात कभी मत भूलो कि तुम हर लम्हा (पल) ज़िंदा व जावेद (अमर) हस्ती (अस्तित्व) ख़ुदा की मुकम्मल (पूर्ण) निगरानी (देखरेख) में हो।
अल्लाह की मज़बूत रस्सी को मज़बूती से थामे रहो। ताग़ूत (शैतानी ताकत) के आगे कभी न झुको। अल्लाह पर ईमान लाओ और अल्लाह को अपना दोस्त बनाओ। अँधेरों से दूर भागो और उजाले से मुहब्बत (प्यार) करो।
अल्लाह की क़ुदरत (ताकत) पर यक़ीन (भरोसा) रखो। वही मारता है और वही जिलाता (जिंदा करता) है।
इसलिए न कभी शक-शुबह (संदेह) में पड़ो और न कभी मायूसी (निराशा) को क़रीब आने दो।
अल्लाह की राह में ख़र्च करो। ख़र्च करके एहसान (उपकार) न जताओ और न किसी के दिल को दुखाओ। तुम्हारे पास देने के लिए न हो तो दिल रखने वाला एक जुमला (वाक्य) कह दो या माज़रत (माफी) कर लो। एहसान जताकर और दिल दुखा कर अपने सदक़े (दान) को बर्बाद मत करो। ख़र्च करो अल्लाह की ख़ुशी हासिल करने के लिए और अपने साथियों को साबित-क़दम (मजबूत) रखने के लिए।
उम्दा (श्रेष्ठ) और पाकीज़ा (पवित्र) माल ख़र्च करो। सदक़े में ऐसी ख़राब चीज़ मत दो जिसे लेना तुम खुद पसंद न करो।
शैतान तुम्हें मुफ़लिसी (गरीबी) से डराता है और बेहयाई (बेशर्मी) की राह सुझाता है। उसके धोखे में न आओ। अल्लाह से लौ लगाओ (प्यार बढ़ाओ)। अल्लाह मग़फ़िरत (माफी) और मेहरबानी (कृपा) का वादा करता है और सदका करने वालों को हिकमत (बुद्धि) की दौलत से नवाजता (इनाम देता) है।
खर्च करते वक्त उन ग़रीबों को तलाश करो जो कहीं घिरे हुए हैं और मजबूर हैं। वे ज़रूरतमंद हैं मगर उनकी ख़ुद्दारी (आत्मसम्मान) उन्हें हाथ फैलाने नहीं देती। अल्लाह को ऐसे ख़ुद्दार लोग पसंद हैं।
अपने अंदर इनफ़ाक़ (दान करना) का जज्बा (भावना) बढ़ाओ। दिन-रात खर्च करो, खुले-छुपे खर्च करो।
सूद (ब्याज) हराम (निषिद्ध) है। अपने माल को सूद से पाक (शुद्ध) रखो, अल्लाह की नाराजगी से बचो और जो सूद तुम्हारा बाकी रह जाए उसे छोड़ दो।
ज़ुल्म (ज्यादती) से बचो और याद रखो कर्ज़ देकर ज्यादा लेना जुल्म है और कर्ज लेकर कम लौटाना भी ज़ुल्म है।
अगर कर्ज़ लेने वाला तंगदस्त (तंगहाल) हो तो खुशहाली तक उसे मोहलत (समय) दो और उसे माफ़ कर दो तो यह ज़्यादा बेहतर है।
क़र्ज का लेन-देन हो तो उसे लिखने का एहतिमाम (प्रबंध) करो, उसके लिए गवाही का इंतिज़ाम (व्यवस्था) करो। जो ख़ुद न लिखवा सके तो उसका वली (अभिभावक) लिखवाए और सरपरस्त (संरक्षक) अल्लाह से डरे और लिखने में कोई कमी-बेशी न करे।
कर्ज़ कम हो या ज्यादा, लिखने में सुस्ती न करो। लिखने वाले और गवाही देने वाले भी अल्लाह से डरें और ऐसा कुछ न करें जिससे किसी फ़रीक (पक्ष) को नुकसान पहुंचे।
अमल (काम) की पाकीज़गी (पवित्रता) की फ़िक्र (चिंता) करो और दिल की सफाई (शुद्धता) का खयाल रखो। याद रखो कि जो तुम्हारे दिल में है और जो तुम्हारे अमल से जाहिर (प्रकट) है, अल्लाह सब से वाक़िफ़ (परिचित) है और सब का हिसाब लेगा।
दीन (धर्म) के प्रचार-प्रसार में अपनी सारी ताकत लगा दो, साथ ही अल्लाह से मदद की दुआ भी करते रहो।
3. सूरह आले-इमरान
अल्लाह के तमाम अहकाम (हुक्म) पर ईमान लाओ और दिल की टेड़ (टेढ़ापन) से अल्लाह की पनाह (शरण) माँगो।
औरतें, बच्चे, सोना-चांदी, घोड़े, मवेशी और खेत – यह सब कुछ दुनिया की चंद दिनों की ज़िंदगी का सामान हैं। उनकी मुहब्बत (प्यार) में गिरफ़्तार (फंसे) न हो और जन्नत के तलबगार (चाहने वाले) बनो।
तुम ऐसे बन जाओ कि सब्र (धैर्य) तुम्हारा शेवा (तरीका) हो, सच्चाई तुम्हारी आदत हो, फ़रमाँबरदारी (आज्ञा मानना) तुम्हारी पहचान हो, अल्लाह की राह में खर्च करना तुम्हारी सिफ़त (खूबी) हो और रात के आखिरी पहर में अल्लाह से इस्तिराफ़ार (तौबा) करना तुम्हारी आदत हो।
याद रखो अल्लाह के आदेशों को झुठलाना और नबियों को कत्ल (मार डालना) करना बहुत बड़ा जुर्म (गुनाह) है, और उन लोगों को क़त्ल करना भी बहुत बड़ा जुर्म है जो लोगों को इंसाफ़ (न्याय) और रास्तबाज़ी (ईमानदारी) की नसीहत (सलाह) करते हैं।
इज्जत व सरबुलंदी (ऊंचाई) का मालिक अल्लाह है। वह जिसे चाहता है इक्तेदार (सत्ता) देता है और जिससे चाहता है छीन लेता है। जिसे चाहता है इज़्ज़त देता है और जिसे चाहता है रुस्वा (अपमानित) कर देता है। सारा ख़ैर (भलाई) उसी के हाथ में है। वह जिसे चाहता है बेहिसाब (बेशुमार) नवाज़ता (इनाम देता) है।
तुम अल्लाह पर ईमान रखते हो तो अल्लाह का इनकार करने वालों को दोस्त न बनाओ और उनसे हर तरह से चौकन्ना (सतर्क) रहो।
तुम अल्लाह से मुहब्बत करते हो तो नबी की पैरवी (अनुसरण) करो, अल्लाह तुमको दोस्त रखेगा। ज़िन्दगी के हर मामले में अल्लाह और उसके रसूल की इताअत (आज्ञापालन) करो।
अपनी औलाद (संतान) के सिलसिले (मामले) में मरियम की माँ से नसीहत लो। किस तरह उनके पैदा होने से पहले ही उन्हें अल्लाह के लिए वक़्फ़ (समर्पित) कर दिया और पैदा हो जाने के बाद यह तमन्ना की कि यह बच्ची शैतान से महफ़ूज़ (सुरक्षित) रहे और इस बच्ची की औलाद भी महफ़ूज़ रहे।
ज़करिया के वाक़ये (घटना) से सबक़ (सीख) लो। दिल में नेक ख़्वाहिश (अच्छी चाहत) पैदा हो तो अल्लाह के सामने दुआ के लिए हाथ फैलाओ। यह मत देखो कि असबाब (साधन) म्वाफ़िक़ (अनुकूल) हैं या मुख़ालिफ़ (विरोधी)। अल्लाह जो चाहे वह कर सकता है। अल्लाह की नेमतों (उपहारों) पर अल्लाह को ख़ूब ख़ूब याद करो।
जब अल्लाह के दीन को मदद की ज़रूरत हो तो देर मत करो और बढ़ कर कहो कि हम हैं अल्लाह के मददगार। अल्लाह की किताब पर ईमान लाने और रसूल की पैरवी करने में ज़रा भी देर न लगाओ और अपने आप को हक़ की गवाही देने वालों की सफ़ (कतार) में खड़ा करो।
अमानत (विश्वास) में खयानत (धोखा) न करो, अपने अहद (वचन) को पूरा करो, अल्लाह की नाराज़गी से बचो, अल्लाह से किए हुए अहद और क़समों का सौदा मत करो। यह अल्लाह के नज़दीक निहायत (अत्यंत) संगीन (गंभीर) जुर्म है। अल्लाह को छोड़ कर किसी को रब न बनाओ, फ़रिश्तों को भी नहीं और नबियों को भी नहीं।
रसूल पर सच्चे दिल से ईमान लाओ और रसूल की मदद के लिए आगे बढ़ो।
इबादत सिर्फ़ अल्लाह की करो। उसके साथ किसी को शरीक (साझी) न ठहराओ, और अल्लाह के सिवा किसी को रब न बनाओ। इन चीज़ों में कभी समझौता न करो और दूसरों को भी इन्हीं उसूलों की दावत दो।
इब्राहीम अल्लाह की तरफ़ पूरी तरह यकसू (एकाग्र/समर्पित) थे और अल्लाह के बहुत ज़्यादा फ़रमाँबरदार (आज्ञाकारी) थे। उन्हीं का रास्ता इख़्तियार (अपनाओ) करो, दूसरे तमाम रास्ते गुमराही (भटकाव) की तरफ़ ले जाने वाले हैं, उनसे होशियार रहो।
अमानत में ख़यानत न करो, अपने अहद को पूरा करो, अल्लाह की नाराज़गी से बचो, अल्लाह से किए हुए अहद और कसमों का सौदा मत करो। यह अल्लाह के नज़दीक निहायत संगीन जुर्म है।
अल्लाह को छोड़ कर किसी को रब न बनाओ, फ़रिश्तों को भी नहीं और नबियों को भी नहीं।
रसूल पर सच्चे दिल से ईमान लाओ और रसूल की मदद के लिए आगे बढ़ो।
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अल्लाह के कलाम (संदेश) को दूसरों तक पहुँचाना सदक़ा-ए-जारिया (निरंतर मिलने वाला पुण्य) है। हो सकता है कि आपके एक शेयर से किसी भटके हुए को हिदायत मिल जाए या किसी का ईमान ताज़ा हो जाए।
भलाई की राह दिखाने वाले को भी उतना ही सवाब (पुण्य) मिलता है, जितना उस पर अमल करने वाले को।
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