तरावीह पारा-4
पारा-4 सूरह आले-इमरान के अंतिम हिस्से और सूरह अन-निसा की शुरुआत पर आधारित है।
अगर वफ़ादारी (निष्ठा) का मक़ाम (दर्जा) चाहते हो तो वह चीजें ख़र्च करो जिन्हें तुम पसंद रखते हो।
ख़ाना-ए-काबा (काबा घर) अल्लाह का सबसे पहला घर है। यह तुम्हारे लिए बरकत (आशीर्वाद) और हिदायत (मार्गदर्शन) का सरचश्मा (स्रोत) है। जो भी वहाँ पहुंच सकता हो, उस पर वाजिब (जरूरी) है कि उसकी ज़ियारत (दर्शन) करे।
अहले-किताब (किताब वालों) के चक्कर में न पड़ो। अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थामे रहो। अल्लाह की नाराज़गी से बचो जिस हद तक बच सको। मरते दम तक दीन-ए-इस्लाम (इस्लाम धर्म) पर कायम (स्थिर) रहो। सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से पकड़ लो और टुकड़े-टुकड़े मत हो। अल्लाह के उस एहसान (कृपा) को याद रखो कि उसने तुम्हारे दिलों को जोड़ दिया और तुम्हें भाई-भाई बना दिया। तुम आग के गड्ढे के किनारे खड़े थे, उसने तुम्हें उसकी तबाही से बचा लिया।
नेकी की तरफ़ बुलाओ, भलाई का हुक्म (आदेश) दो और बुराईयों से रोकते रहो। उन लोगों की तरह न हो जाओ जो रौशन (उज्ज्वल) आयतों के आ जाने के बाद भी हक़ (सत्य) से भटक गए और टुकड़े-टुकड़े हो गए।
तुम उनका तरीका इख़्तियार (अपनाओ) करो जो सही मार्ग पर क़ायम (स्थिर) हैं। रात के वक़्तों में अल्लाह की आयतों की तिलावत (पाठ) करते हैं और उसके आगे सजदे में होते हैं। अल्लाह और आख़िरत (परलोक) के दिन पर ईमान रखते हैं, भलाई का हुक्म देते हैं, बुराई से रोकते हैं और भलाई के कामों में एक दूसरे से आगे रहने की कोशिश करते हैं।
दुश्मनों को अपना राज़दार (भेदिया) मत बनाओ। उनकी शरारतों से बचो। सब्र (धैर्य) और तक़वा (परहेज़गारी) का दामन (आंचल) थामे रहो। अल्लाह की राह में निकलो तो पस्त-हिम्मती (निराशा) न दिखाओ।
अल्लाह की नाराज़गी से बचो। बढ़ा-चढ़ा कर सूद न खाओ। अल्लाह और रसूल की इताअत (आज्ञापालन) करो और तेज़ी से बढ़ो अपने रब की बख्शिश (कृपा) और उस जन्नत की तरफ़ जिसकी वुसअत (विस्तार) आसमानों और ज़मीनों के बराबर है।
जिनके दिल तक़वा (परहेज़गारी) से मालामाल (भरे हुए) हैं, वे अमीरी-गरीबी हर हाल में ख़र्च करते हैं। गुस्से को पी जाते हैं और दूसरों के कुसूर (गलतियाँ) माफ़ कर देते हैं। यह भलाई करने वाले लोग हैं जिन्हें अल्लाह पसंद करता है।
कभी कोई फ़हश (अश्लील) काम कर बैठें तो वे फ़ौरन (तुरंत) अल्लाह को याद करते हैं और अपने गुनाहों की माफ़ी मांगते हैं। ग़लती पर इसरार (जिद) नहीं करते। ऐसे लोगों के लिए अल्लाह की मग़फ़िरत (माफी) और जन्नत है।
पस्त-हिम्मती (कम हौसला) न दिखाओ, ग़म (दुख) न करो, ईमान पर क़ायम रहो, ऐसा करोगे तो तुम ही ग़ालिब (विजयी) रहोगे।
क्या तुमने यह समझ रखा है कि यूँ ही जन्नत में चले जाओगे हालांकि अभी अल्लाह ने यह तो देखा ही नहीं कि तुममें कौन लोग उसकी राह में जिहाद (संघर्ष) करने वाले हैं और कौन लोग उसकी ख़ातिर सब्र करने वाले हैं।
मुहम्मद सल्ल० अल्लाह के रसूल हैं। उनसे पहले बहुत से रसूल आए और चले गए। अगर वह क़त्ल हो जाएं या फ़ौत हो जाएं तो क्या उनका रास्ता छोड़ दोगे? नहीं, ऐसा न करना। जब तक जीवित रहो अल्लाह के रास्ते पर चलते रहो, चाहे कुछ भी हो जाए।
अल्लाह से दुआ करो कि ऐ हमारे रब! हमारी ग़लतियों और कोताहियों (कमियों) से दरगुज़र (माफ़ी) फ़रमा। हमारी बे-ऐतेदालियों (अन्याय) को माफ़ कर दे। हमारे क़दम जमा दे और काफ़िरों (अविश्वासियों) के मुक़ाबले में हमारी मदद कर।
अल्लाह का इनकार करने वालों की बात मत मानो। अल्लाह को अपना हामी (समर्थक) व मददगार बना लो। कमज़ोरी मत दिखाओ, आपस में झगड़े न करो, मौत से न डरो, दुनिया की मुहब्बत में मत गिरफ़्तार (फंसो) हो और आख़िरत की तलब (चाहत) पैदा करो। ऐसा करोगे तो अल्लाह की मदद अपने क़रीब पाओगे। अल्लाह से डरो, शैतान के साथियों से मत डरो। उनकी सरगर्मियों (गतिविधियों) से तुम ख़ौफ़ज़दा (डरा हुआ) न हो, यह अल्लाह का कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
इज़हार-ए-हक़ (सत्य का खुलासा) में कंजूसी से काम न लो, यह कंजूसी आख़िरत में गले का तौक़ (बोझ) बन जाएगी। याद रखो कि हर नफ़्स (प्राणी) को मौत का मज़ा चखना है और सब को आख़िरत में पूरा-पूरा बदला मिलना है। दुनिया के धोखे में न रहो, आख़िरत की कामयाबी की फ़िक्र (चिंता) करो।
दीन की राह में आज़माइशों (परख) पर सब्र करो, किताब-ए-इलाही (ईश्वरीय किताब) की तालीमात (शिक्षाएँ) लोगों में आम करो, उसमें कुछ भी मत छिपाओ। कायनात (सृष्टि) की निशानियों में ग़ौर व फ़िक्र (ध्यान व सोच) करो। उठते-बैठते और लेटते हर हाल में अल्लाह को याद करो और जहन्नम (नर्क) के अज़ाब (यातना) से बचने की फ़िक्र करो। इत्मिनान (यकीन) रखो अल्लाह किसी का अमल (कर्म) जाया (व्यर्थ) नहीं करेगा, चाहे मर्द हो या औरत। अल्लाह के दीन के लिए जिन लोगों ने भी जान व माल की कुर्बानियाँ दी हैं, अल्लाह उन्हें उनकी क़ुर्बानियों का भरपूर बदला अता (देगा) फ़रमाएगा और उन्हें सदाबहार (हमेशा रहने वाली) जन्नतों में दाख़िल (प्रवेश) करेगा।
कुफ़्र (अविश्वास) करने वालों की सरगर्मियों और पेशक़दमियों (आगे बढ़ने) से धोखा मत खाओ, उनका अंजाम अच्छा नहीं होगा।
सब्र से काम लो, साबित-क़दम (मजबूत) रहो, हक़ की मदद के लिए सदैव तैयार रहो और अल्लाह की नाफ़रमानी (अवज्ञा) से बचते रहो।
4. सूरह अन-निसा
अल्लाह से डरो और रिश्तों का एहतिराम (सम्मान) करो। यतीमों (अनाथों) का माल उनके हवाले (सुपुर्द) कर दो। उनका माल खाने की कोशिश न करो क्योंकि वह तुम्हारे लिए हराम (निषिद्ध) और नुकसानदेह है।
तुम्हें यतीमों के बारे में इंसाफ़ (न्याय) करना है और औरतों के बारे में भी इंसाफ करना है।
औरतों के मेहर ख़ुशदिली के साथ अदा कर दो। यतीमों के माल की बेहतर निगरानी करो। जब वो बड़े और समझदार हो जाएं तो उनका माल उनके हवाले कर दो।
अल्लाह ने विरासत (उत्तराधिकार) के हिस्सेदार तय कर दिए हैं, अल्लाह के बताए हुए हिस्सों के मुताबिक़ हर एक का हक़ उसके हवाले करो। विरासत में से यतीमों का हक़ हरगिज़ (कदापि) मत मारो।
विरासत तकसीम (बाँटने) के मौके पर अज़ीज़ (प्रियजन) और रिश्तेदार और यतीम व मिस्कीन (गरीब) आएं तो उस माल में से उनको भी कुछ दे दो।
मय्यत (मृत व्यक्ति) के क़र्ज़ और उसकी वसीयतों को विरासत की तकसीम से पहले अदा करो। ऐसी वसीयत न करो जिससे किसी का हक़ मारा जाए। ख़ानदान (परिवार) और समाज में बेहयाई (बेशर्मी) मत फैलने दो। उसे रोकने के लिए असरदार (प्रभावी) क़दम उठाओ।
गुनाह कर बैठो तो सच्चे दिल से जल्द से जल्द तौबा (पश्चाताप) कर लो, न हठधर्मी से काम लो और न तौबा करने के लिए मरने के वक़्त का इंतज़ार करो।
औरतों को सताओ मत, उनके साथ ज़ुल्म (अत्याचार) का रवैया (व्यवहार) मत इख़्तियार (अपनाओ) करो। अगर अलगाव की नौबत (स्थिति) आ जाए तो उनको दिया हुआ माल उनसे वापस लेने की कोशिश मत करो। उनके साथ भले तरीके से ज़िन्दगी बसर (बिताओ) करो। जहाँ तक हो सके उनके साथ खूबसूरती से निबाह (रिश्ता निभाना) करने की कोशिश करो।
अल्लाह ने जो रिश्ते हराम क़रार दिए हैं उनकी हुरमत (इज्जत) का लिहाज़ (ख्याल) करो।
👉 यह लेख बार-बार पढ़ें ताकि इसमें छिपी गहराइयाँ आपके दिल और अमल में उतर सकें। हर बार पढ़ने पर आपको दीन की एक नई समझ हासिल होगी।
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अल्लाह के कलाम (संदेश) को दूसरों तक पहुँचाना सदक़ा-ए-जारिया (निरंतर मिलने वाला पुण्य) है। हो सकता है कि आपके एक शेयर से किसी भटके हुए को हिदायत मिल जाए या किसी का ईमान ताज़ा हो जाए।
भलाई की राह दिखाने वाले को भी उतना ही सवाब (पुण्य) मिलता है, जितना उस पर अमल करने वाले को।
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