हाल ही के भू-राजनीतिक बदलावों के बीच मध्य पूर्व (Middle East) के देशों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं। एक ओर जहाँ इजराइल की स्थिति अस्थिर दिखाई दे रही है और अमेरिका इस क्षेत्र से अपने कदम पीछे खींचता नजर आ रहा है, वहीं दूसरी ओर तकनीकी और वैज्ञानिक रूप से उन्नत ईरान एक बड़ी ताकत बनकर उभर रहा है। इस जटिल स्थिति को समझने और भविष्य के किसी बड़े टकराव को टालने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना बेहद जरूरी है।
जर्मनी का ऐतिहासिक उदाहरण
इतिहास गवाह है कि जब जर्मनी तकनीकी और वैज्ञानिक रूप से बहुत शक्तिशाली था, तो उसने प्रथम विश्व युद्ध में पूरे यूरोप पर कब्जा कर लिया था। बाद में अमेरिका के हस्तक्षेप से जर्मनी को हराया गया और उस पर भारी प्रतिबंध लगाकर उसे अपमानित किया गया। इस अपमान और आर्थिक बर्बादी से हिटलर का जन्म हुआ, जिसने विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल कर द्वितीय विश्व युद्ध को जन्म दिया।
इसके बाद, यूरोप ने समझ लिया कि तीसरा विश्व युद्ध टालने के लिए जर्मनी को अलग-थलग करने के बजाय उसे साथ लेकर चलना होगा। उन्होंने अपनी अर्थव्यवस्थाओं, स्टील उद्योगों, बाजारों और यहाँ तक कि शिक्षा प्रणाली (सिलेबस) को जर्मनी के साथ एकीकृत कर लिया। इसी दूरदर्शी सोच के परिणामस्वरूप अंततः ‘यूरोपीय संघ’ (European Union) और उसकी संसद का निर्माण हुआ।
मध्य पूर्व की वर्तमान चिंता
आज मध्य पूर्व के देशों को यह डर सता रहा है कि ताकतवर ईरान उनके साथ कैसा व्यवहार करेगा। उनके मन में मुख्य रूप से ये सवाल उठ रहे हैं:
- क्या ईरान अपनी मिसाइलों का रुख उनकी तरफ कर देगा?
- क्या ईरान अपना तेल और गैस इतना सस्ता बेचेगा कि बाकी अरब देशों का तेल बिकना ही बंद हो जाए और उनकी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ठप हो जाए?
समाधान: यूरोपीय संघ की तर्ज पर एकीकरण
- यूरोप ने जो तरीका अपनाया था, ठीक वही तरीका मध्य पूर्व को ईरान के साथ अपनाना चाहिए। ईरान से डरने या उसे अलग करने के बजाय, उसे साथ मिलाने की जरूरत है:
- आर्थिक एकीकरण और साझा बाजार: मध्य पूर्व के देशों को ईरान को अपने तेल और गैस कार्टेल (Oil & Gas Cartel) में शामिल करना चाहिए। पूरे क्षेत्र के लिए एक कॉमन ट्रेड और कमोडिटी एक्सचेंज बनना चाहिए, ताकि तेल और गैस की कीमतें कोई बाहरी देश नहीं, बल्कि वे सब मिलकर खुद तय कर सकें।
- शिक्षा और रिसर्च का विस्तार: ईरान के तकनीकी रूप से उन्नत सिलेबस और रिसर्च संस्थानों को अपनाकर पूरे मध्य पूर्व के स्कूलों और कॉलेजों की शिक्षा प्रणाली को बेहतर बनाया जाना चाहिए।
- साझा संसद और मुद्रा: उस्मानिया सल्तनत (Ottoman Empire) के दौर की तरह, जहां शिया-सुन्नी सब मिल-जुलकर रहते थे, आज एक ‘मिडिल ईस्ट पार्लियामेंट’ (यूरोपीय संघ की तर्ज पर) बनाने की जरूरत है। इसके साथ ही एक साझा मुद्रा (Common Currency) भी होनी चाहिए जिसमें तेल और गैस का व्यापार हो सके।
निष्कर्ष
यदि मध्य पूर्व के देश आपसी मतभेद भुलाकर एकजुट हो जाएं और अपनी अर्थव्यवस्थाओं को आपस में जोड़ लें, तो कोई भी बाहरी देश या ताकत उन्हें कुचल नहीं पाएगी। इस एकता से न केवल पूरे क्षेत्र में शक्ति और शांति का संचार होगा, बल्कि फिलिस्तीन, सूडान और सोमालिया जैसे संघर्षरत देशों की भी मदद हो सकेगी, जिससे वहां के आम लोगों को भी सुरक्षित छत और भोजन मिल सकेगा।