मुंदार खातून (जिन्हें तारीख़ में मुंदार, मूंंदर या सुंदर-मुंदर भी कहा गया है) रानी लक्ष्मीबाई की सिर्फ एक मुहाफ़िज़ (बॉडीगार्ड) नहीं थीं, बल्कि उनकी सबसे वफ़ादार दोस्त, हमराज़ और आखिरी सांस तक साथ निभाने वाली जांबाज खातून थीं।
1857 की पहली जंगे-आज़ादी में मुंदार का रोल और उनकी वफ़ादारी हिंदुस्तान की तारीख़ का एक बेहद शानदार हिस्सा है। उनके बारे में पुख्ता तारीख़ी हक़ीक़तों (ऐतिहासिक सबूतों) के मुताबिक पूरी जानकारी नीचे दी गई है:
शुरुआती ज़िंदगी और रानी से ताल्लुक
मुंदार एक मुस्लिम घराने से थीं। वह बचपन से या फिर रानी लक्ष्मीबाई की शादी के बाद से ही उनके साथ झांसी के महल में आ गई थीं। रानी लक्ष्मीबाई ने झांसी में औरतों की एक खास फौजी टुकड़ी तैयार की थी, जिसमें मुंदार और काशीबाई जैसी लड़कियों को घुड़सवारी, तलवारबाज़ी और जंग के हुनर में माहिर किया गया था। मुंदार इस महिला फौज की एक मजबूत कमान थीं।
1857 की जंग और अटूट वफ़ादारी
जब मार्च 1858 में ब्रिटिश जनरल ह्यूरोज ने झांसी के किले को घेरा, तब मुंदार ने रानी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जंग लड़ी।
जब झांसी के गद्दार दुलहाजू की वजह से अंग्रेजों ने किले के एक दरवाज़े को खोल दिया और रानी को किला छोड़ना पड़ा, तब मुंदार, काशीबाई, गुलाम गौस खान और खुदा बख्श जैसे चुनिंदा वफ़ादारों ने रानी को चारों तरफ से घेरकर हिफ़ाज़त से बाहर निकाला।
झांसी से कालपी और फिर ग्वालियर तक के मुश्किल सफ़र और खौफनाक जंगों में मुंदार साए की तरह रानी लक्ष्मीबाई के साथ रहीं।
शहादत: आख़िरी दिन की तारीख़ी हक़ीक़त

मुंदार की शहादत 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय के मैदान में हुई, जो रानी लक्ष्मीबाई की शहादत (18 जून) से ठीक एक दिन पहले या लगभग साथ में ही हुई थी।
ब्रिटिश दस्तावेज़ों और नेशनल आर्काइव्स ऑफ इंडिया (National Archives of India) में दर्ज उस वक्त के गवर्नर जनरल के एजेंट रॉबर्ट हैमिल्टन की 30 अक्टूबर 1858 की रिपोर्ट के मुताबिक:
“रानी लक्ष्मीबाई एक घोड़े पर सवार थीं। उनके साथ एक और मुस्लिम खातून (मुंदार) सवार थीं, जो कई सालों से उनकी खादिम (दासी) और दोस्त थीं। दोनों ही बंदूक की गोलियां लगने की वजह से लगभग एक साथ घोड़े से नीचे गिर गईं।”
तारीख़दानों के ब्योरे के मुताबिक मुंदार को अंग्रेजों की गोली लगी और उन्होंने जंग के मैदान में ही दम तोड़ दिया। अपनी सबसे प्यारी दोस्त मुंदार को अपनी आंखों के सामने दम तोड़ते देख रानी लक्ष्मीबाई बेहद गुस्से में आ गई थीं और उन्होंने उस ब्रिटिश टुकड़ी पर जोरदार हमला बोल दिया था।
तारीख़ में अहमियत
मुंदार खातून का किरदार इस बात की जीती-जागती मिसाल है कि 1857 की क्रांति में मज़हब की दीवारें कहीं आड़े नहीं आईं। वह रानी लक्ष्मीबाई के सुख-दुख की साथी थीं—महल के अंदर दोस्त और मैदान-ए-जंग में मुहाफ़िज़।
अमृतलाल नागर और वृंदावनलाल वर्मा जैसे मशहूर लेखकों ने अपने उपन्यासों और तारीख़ी रिसर्च में मुंदार के हौसले और रानी के प्रति उनके बेलोस प्यार (निःस्वार्थ प्रेम) को खास तौर पर बयां किया है।
