By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
NoorPostNoorPost
  • होम
  • न्यूज़
    • राष्ट्रीय
    • अंतरराष्ट्रीय
    • मुस्लिम दुनिया
  • इतिहास
    • मुस्लिम वैज्ञानिक
    • सामाजिक कार्यकर्ता
    • स्वतंत्रता सेनानी
    • उस्मानी साम्राज्य
    • जीवनी
  • वीडियो
  • ब्लॉग
  • मजहब
  • अन्य
    • खान-पान
    • स्वास्थ्य
    • शिक्षा
    • रोजगार
    • साइंस-टेक्नोलॉजी
      • मोबाइल
Sign In
नोटिफिकेशन और दिखाएं
Font Resizerआ
Font Resizerआ
NoorPostNoorPost
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • मुस्लिम दुनिया
  • इतिहास
  • खान-पान
  • ब्लॉग
  • मजहब
  • रोजगार
  • वीडियो
  • शिक्षा
  • साइंस-टेक्नोलॉजी
  • सोशल मीडिया
  • स्वास्थ्य
Search
  • प्रमुख पेज
    • होम
    • संपर्क करें
    • गोपनीयता नीति
    • अस्वीकरण
    • सर्च करें
  • मेरी चीजें
    • सुरक्षित पोस्ट
    • मेरे लिए
    • पढ़े गए पोस्ट
    • पसंदीदा टॉपिक्स
    • पसंदीदा लेखक/लेखिका
  • Categories
    • मुस्लिम दुनिया
    • राष्ट्रीय
    • अंतरराष्ट्रीय
    • इतिहास
    • खान-पान
    • ब्लॉग
    • मजहब
    • शिक्षा
    • स्वास्थ्य
    • रोजगार
    • वीडियो
    • साइंस-टेक्नोलॉजी
    • सोशल मीडिया
Sign In Sign In
Follow US
> इतिहास > 18वीं सदी का वो ‘क्रेजी’ सुल्तान ‘शाह रंगीला’ जिसने मुग़ल सल्तनत को मुजरे में उड़ा दिया

18वीं सदी का वो ‘क्रेजी’ सुल्तान ‘शाह रंगीला’ जिसने मुग़ल सल्तनत को मुजरे में उड़ा दिया

जिसे लोग 'मुग़लिया नूर' कहते थे, लेकिन ज़माना उसे 'शाह रंगीला' के नाम से जानता है। आज के युवा जब 'नाइटलाइफ़', 'इवेंट मैनेजमेंट' और 'कूल लाइफस्टाइल' की बात करते हैं, तो उन्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि आज से 300 साल पहले दिल्ली का एक बादशाह इन सब का 'गॉडफ़ादर' बन चुका था।
एо अहमद
एо अहमद
एо अहमद
लेखकएо अहमद
Founder and Editor
मैं आफताब अहमद इस साइट पर एक लेखक हूं, मुझे विभिन्न शैलियों और विषयों पर लिखना पसंद है। मुझे ऐसा निबंध और ब्लॉग लिखना अच्छा लगता...
Follow:
Published: 28/09/2026
No Comments
शेयर
27 मिनट में पढ़ें

18वीं सदी के हिंदुस्तान की एक ऐसी कहानी, जो इतिहास की किताबों में अक्सर दबा दी जाती है। यह कहानी शुरू होती है 28 सितंबर 1719 के उस ऐतिहासिक दिन से, जब दिल्ली के तख्त पर एक ऐसा सुल्तान बैठा जो जंग के मैदान में तोपें ले जाना भूल जाता था, लेकिन दरबार में कपड़े पहनना कभी याद नहीं रखता था। जिसे लोग ‘मुग़लिया नूर‘ कहते थे, लेकिन ज़माना उसे ‘शाह रंगीला‘ के नाम से जानता है।

हाईलाइट्स
  • किंगमेकर्स का वो दौर: जब ‘सैयद ब्रदर्स’ की उंगलियों पर नाचती थी मुग़लिया सल्तनत
  • जेल से सीधे तख्त-ए-ताऊस: ‘रोशन’ का ‘शाह रंगीला’ बनने का सफर
  • जब लाल किला बना ‘पार्टी हब’: रंगीला की अतरंगी लाइफस्टाइल और शौक
  • साइलेंट किलर: बिना हाथ रंगे ‘सैयद भाइयों’ का द एंड
  • ‘द ग्रेट मुग़ल सर्कस’: जब दरबार में बिना कपड़ों के आ जाते थे बादशाह
  • साम्राज्य के टुकड़े-टुकड़े और बादशाह का परमानेंट ‘चिल मोड’
  • साल 1739: जब नादिरशाह आया और रंगीला तोपें दिल्ली ही भूल गया!
  • दिल्ली का वो भयानक कत्लेआम: जब नालियों में खून बह रहा था
  • कोहिनूर और तख्त-ए-ताऊस की विदाई: जब रोई दिल्ली और हँसा लुटेरा
  • आख़िरी दिन: अय्याशी का वो अंत जिसने इतिहास का रुख बदल दिया
  • निष्कर्ष: इतिहास का वो पन्ना जिसे भुलाया मुमकिन नहीं
  • बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
  • 📢 इसे शेयर करें, कमेंट करें और सपोर्ट करें!


आज के युवा जब ‘नाइटलाइफ़’, ‘इवेंट मैनेजमेंट’ और ‘कूल लाइफस्टाइल’ की बात करते हैं, तो उन्हें अंदाज़ा भी नहीं है कि आज से 300 साल पहले दिल्ली का एक बादशाह इन सब का ‘गॉडफ़ादर’ बन चुका था। 27 साल की एक ऐसी बादशाहत, जिसने मुग़ल साम्राज्य की जड़ों को हिलाकर रख दिया, लेकिन खुद सत्ता की कुर्सी पर ऐसा फेविकोल लगाकर बैठा रहा कि बाबर, हुमायूं और जहांगीर जैसे सूरमाओं के रिकॉर्ड भी पीछे छूट गए।


आइए चलते हैं मुग़ल इतिहास के उस दौर में, जहाँ गद्दी के लिए कत्लेआम आम बात थी, जहाँ वज़ीर ही असली ‘किंगमेकर’ थे, और जहाँ एक 19 साल के लड़के ने जेल से निकलकर हिंदुस्तान की तक़दीर और तस्वीर दोनों को हमेशा के लिए बदल दिया।

किंगमेकर्स का वो दौर: जब ‘सैयद ब्रदर्स’ की उंगलियों पर नाचती थी मुग़लिया सल्तनत

कहानी शुरू होती है साल 1707 से। कड़क और जिद्दी मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब की मौत हो चुकी थी। औरंगज़ेब ने अपने पीछे एक ऐसा बिखरा हुआ साम्राज्य छोड़ा था, जहाँ गद्दी का मतलब सिर्फ और सिर्फ मौत का वारंट था। औरंगज़ेब के बाद उसका 65 साल का बूढ़ा बेटा बहादुर शाह प्रथम (शाह आलम) गद्दी पर बैठा। लेकिन वह सिर्फ 5 साल ही टिक सका और 1712 में उसकी मौत हो गई।


इसके बाद मुग़ल दरबार में एक नया और ख़तरनाक खेल शुरू हुआ। दरबार में दो भाइयों का दबदबा बढ़ा, जिन्हें इतिहास ‘सैयद ब्रदर्स’ (सैयद बंधु) के नाम से जानता है—अब्दुल्लाह ख़ान और हुसैन अली ख़ान। ये दोनों भाई उस दौर के ‘किंगमेकर’ थे। मुग़ल दरबार इनके लिए एक कठपुतली का खेल बन चुका था।

सल्तनत हमारी, वज़ीर हमारा, बादशाह तो बस एक मोहरा है जिसे हम जब चाहें बना दें, जब चाहें मिटा दें।
— मुग़ल दरबार के गलियारों में गूंजती सैयद भाइयों की अनकही हुकूमत।

अगले 9 सालों के भीतर मुग़ल तख्त पर चार बादशाह आए और गए। किसी का कत्ल कर दिया गया, किसी को अंधा कर दिया गया, तो किसी को जहर दे दिया गया। जहांदार शाह, फ़र्रुख़सियर, रफ़ी उद-दर्जात और रफ़ी उद-दौलत—ये सब सैयद भाइयों की मर्जी से आए और उनकी मर्जी से ही मौत के घाट उतार दिए गए। दिल्ली का लाल किला साजिशों का एक ऐसा अड्डा बन चुका था जहाँ हर सुबह एक नई लाश और हर शाम एक नया सुल्तान देखने को मिलता था।

जेल से सीधे तख्त-ए-ताऊस: ‘रोशन’ का ‘शाह रंगीला’ बनने का सफर

जब सारे मोहरे ख़त्म होने लगे, तो सैयद भाइयों की नज़र जेल की कालकोठरी में बंद एक 19 साल के नौजवान पर पड़ी। इस लड़के का नाम था रोशन अख्तर। रोशन कोई और नहीं, बल्कि बहादुर शाह प्रथम का पोता था। उसके पिता को गद्दी की जंग में पहले ही कत्ल किया चुका था और उसके सगे चचा जहांदार शाह ने उसे और उसकी माँ को कैद में डाल दिया था ताकि कोई और दावेदार जिंदा न बचे।


साल 1719 की एक सुबह, इस डरे-सहमे लड़के को जेल से बाहर निकाला गया। उसे नहलाया गया, कीमती लिबास पहनाए गए और दिल्ली के तख्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) पर बिठा दिया गया। उसका नया शाही नाम रखा गया—अबू अल-फतह नासिर-उद-दीन रोशन अख्तर शाह बहादुर पादशाह गाजी। लेकिन दिल्ली की जनता ने उसके मिजाज को देखकर उसे एक बेहद छोटा और सटीक नाम दिया—रंगीला।


एक ऐसा लड़का जिसने अपनी जवानी के सबसे खूबसूरत साल जेल की अंधेरी कोठरियों में, मौत के साये में गुजारे हों, उसे अचानक दुनिया के सबसे अमीर साम्राज्य का मालिक बना दिया गया। नतीजा क्या होना था? उसने तय किया कि अब वह जिंदगी का हर वो लम्हा जिएगा जिसे उसने कैद में मिस किया था।

जब लाल किला बना ‘पार्टी हब’: रंगीला की अतरंगी लाइफस्टाइल और शौक

शाह रंगीला को जंग, राजनीति और कूटनीति से सख्त नफरत थी। उसे अगर किसी चीज़ से मोहब्बत थी, तो वो था हुस्न, संगीत, शराब और अंतहीन पार्टियाँ। औरंगज़ेब के शासनकाल में दिल्ली में जिन चीज़ों पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई थी, रंगीला ने आते ही उन सबके दरवाजे पूरी तरह खोल दिए।

कला और कव्वाली का पुनर्जन्म

औरंगज़ेब के दौर में जिन फनकारों, नर्तकियों, शायरों और गवैयों को दिल्ली छोड़कर भागना पड़ा था, रंगीला के आते ही उनके ‘अच्छे दिन’ लौट आए। लाल किले के दीवान-ए-खास से लेकर दिल्ली की तंग गलियों तक, हर तरफ संगीत की धुनें गूंजने लगीं।

  • ख्याल गायकी: शास्त्रीय संगीत में ‘ख्याल गायकी’ को बढ़ावा देने का सबसे बड़ा श्रेय रंगीला को ही जाता है। उसके दरबार के महान संगीतकार ‘सदारंग’ और ‘अदारंग’ ने सैकड़ों ऐसे गीतों की रचना की जो आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत का आधार हैं।
  • सूफी कव्वाली और उर्दू: रंगीला के दौर में ही उर्दू ज़बान को शाही संरक्षण मिला और वह आम लोगों की भाषा से उठकर शायरी और दरबार की भाषा बन गई। कव्वाली की महफिलें अब सिर्फ दरगाहों तक सीमित नहीं थीं, वे शाही महलों का हिस्सा बन चुकी थीं।

फैशन आइकन: अचकन की शुरुआत

क्या आप जानते हैं कि जो ‘अचकन’ या ‘शेरवानी’ भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पहनते थे और जिसे आज भी शादियों में सबसे रॉयल लुक माना जाता है, उसकी शुरुआत इसी शाह रंगीला ने की थी? उस ज़माने में मुग़ल एलीट क्लास घाघरे जैसी लंबी और ढीली पोशाकें पहनता था। रंगीला ने इस चलन को बदला और चुस्त, सीधे कट वाली आधुनिक ‘अचकन’ को बढ़ावा दिया, जो देखने में बेहद स्लीक और ट्रेंडी लगती थी।

साइलेंट किलर: बिना हाथ रंगे ‘सैयद भाइयों’ का द एंड

शुरुआत में सैयद भाइयों को लगा कि यह 19 साल का लड़का उनकी उंगलियों पर नाचने वाला सबसे बेहतरीन खिलौना साबित होगा। लेकिन रंगीला भले ही अय्याश था, पर बेवकूफ नहीं था। वह जानता था कि जब तक ये दोनों भाई जिंदा हैं, उसकी गर्दन पर हमेशा तलवार लटकी रहेगी।


यहाँ रंगीला ने अपनी ‘क्रिएटिव पॉलिटिक्स’ का जलवा दिखाया। उसने खुद सीधे तौर पर कोई कदम नहीं उठाया, बल्कि दरबार में सैयद भाइयों के दुश्मनों (जैसे निज़ाम-उल-मुल्क और तुराणी गुट) को चुपके से शह देना शुरू कर दिया।


सत्ता में आने के मात्र दो साल के भीतर, यानी 1720 में, एक सैयद भाई (हुसैन अली ख़ान) का रास्ते में कत्ल कर दिया गया। जब दूसरे भाई (अब्दुल्लाह ख़ान) ने बगावत करने की कोशिश की, तो उसे कैद कर लिया गया और बाद में जहर दे दिया गया। मजेदार बात यह थी कि इन दोनों घटनाओं में सीधे तौर पर बादशाह का नाम कहीं नहीं आया।


“दुश्मन भी साफ हो गया और हाथों पर खून का एक कतरा भी न लगा। सियासत की इस कलाकारी में रंगीला का कोई सानी नहीं था।”

अब दरबार पूरी तरह साफ था। रंगीला के सामने रोकने-टोकने वाला कोई नहीं था। अब शुरू होना था असली ‘रंगीला राज’।

‘द ग्रेट मुग़ल सर्कस’: जब दरबार में बिना कपड़ों के आ जाते थे बादशाह

सैयद भाइयों के खात्मे के बाद शाह रंगीला ने शासन को पूरी तरह अल्लाह भरोसे छोड़ दिया। दरबार का माहौल किसी गंभीर प्रशासनिक बैठक जैसा नहीं, बल्कि किसी ‘कॉमेडी शो’ या ‘कल्चरल इवेंट’ जैसा हो गया था। इतिहासकार गुलाम हुसैन ख़ान की किताबों और उस दौर के दस्तावेज़ों में रंगीला की ऐसी अतरंगी हरकतों का ज़िक्र है जिन्हें सुनकर आज के दौर के लोग भी अपना सिर पकड़ लेंगे।

बिना कपड़ों के दरबार

हाँ, यह बिल्कुल सच है। कई बार रात भर शराब और शबाब के नशे में डूबने के बाद, रंगीला सुबह सीधे दरबार में चला आता था। लेकिन ट्विस्ट यह था कि वह कपड़े पहनना ही भूल जाता था। वह पूरी तरह नग्न (न्यूड) अवस्था में दरबारियों के सामने आ बैठता था। दरबारी अपनी आँखें नीचे झुकाए रहते और बादशाह सलामत उसी हालत में फरमान जारी करते थे।

दरबारियों के लिए ड्रेस कोड: जनाने कपड़े और घुंघरू

रंगीला को अजीबोगरीब एक्सपेरिमेंट करने का शौक था। कभी-कभी उसका मन करता तो वह पूरे दरबार के लिए ‘थीम बेस्ड’ ड्रेस कोड लागू कर देता।

  • वह आदेश देता कि कल सभी कड़क मिजाज वज़ीर, सेनापति और दरबारी औरतों वाले (जनाने) रेशमी कपड़े और घाघरा पहनकर दरबार में हाजिर होंगे।
  • कई बार वह किसी बड़े और सम्मानित वज़ीर से कहता, “कल आप पैरों में घुंघरू बांधकर आएंगे और महफिल में थिरकेंगे, अगर नहीं आए तो सीधे जेल भेज दिए जाओगे।” अपनी जान और इज्जत बचाने के लिए बूढ़े-बूढ़े सिपहसालारों को भी यह तमाशा करना पड़ता था।

‘नपुंसक’ के ताने पर बनाई वो बोल्ड पेंटिंग

रंगीला के इस रवैये को देखकर साम्राज्य के कड़क और लड़ाकू जनरल्स पीठ पीछे थू-थू करते थे। कुछ दरबारियों ने तो उसे गुप्त रूप से ‘नपुंसक’ या ‘नामर्द’ तक कहना शुरू कर दिया था क्योंकि उसने कभी तलवार नहीं उठाई थी। जब यह बात रंगीला के कानों तक पहुँची, तो उसने युद्ध के मैदान में जाने के बजाय एक अलग ही तरीका चुना।


उसने अपने शाही चित्रकार से लाल किले के भीतर लाइव यौनकर्म (Live Sex) करते हुए अपनी एक बेहद बोल्ड और इंटिमेट पेंटिंग बनवाई, ताकि वह दुनिया को अपनी मर्दानगी का सबूत दे सके। मुग़ल इतिहास की यह सबसे विवादित और बोल्ड पेंटिंग आज भी इंटरनेट और डिजिटल आर्काइव्स (जैसे गूगल) पर मौजूद है, जिसे देखकर लोग हैरान रह जाते हैं कि क्या कोई मुग़ल बादशाह ऐसा भी हो सकता था?

साम्राज्य के टुकड़े-टुकड़े और बादशाह का परमानेंट ‘चिल मोड’

जब राजा चौबीसों घंटे नशे और नाच-गाने में मस्त हो, तो राज्य के वफादार और महत्वाकांक्षी सिपहसालार कब तक चुप बैठते? रंगीला के दरबार की एक और खासियत थी—यहाँ योग्यता की कोई कीमत नहीं थी। कोई भी कव्वाल, कोई ज्योतिषी, कोई चमचा या कोई बाबा रातों-रात बादशाह का पसंदीदा बनकर देश का वज़ीर (प्रधानमंत्री) बन जाता था, और अगले ही दिन उसे हटाकर किसी दूसरे नचनिये को वो कुर्सी दे दी जाती थी।


इस अराजकता का फायदा उठाकर मुग़ल साम्राज्य ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगा:

  • अवध: सआदत ख़ान ने खुद को अवध का स्वतंत्र नवाब घोषित कर दिया।
  • बंगाल: मुर्शिद कुली ख़ान और अलीवर्दी ख़ान ने बंगाल को दिल्ली से अलग कर लिया।
  • दक्खन (हैदराबाद): निज़ाम-उल-मुल्क, जो रंगीला की हरकतों से तंग आ चुका था, दिल्ली छोड़कर दक्षिण चला गया और हैदराबाद के स्वतंत्र राज्य की नींव रखी।
  • मराठे: बाजीराव पेशवा के नेतृत्व में मराठे इतने ताकतवर हो चुके थे कि वे दिल्ली की सीमाओं तक चढ़ आए थे और मुग़ल सेना सिर्फ तमाशा देख रही थी।

साम्राज्य सिकुड़ रहा था, खजाना खाली हो रहा था, लेकिन रंगीला का ‘चिल मोड’ परमानेंट था। जब भी कोई दूत भागता हुआ दरबार में आता और कहता, “जिल्ल-ए-इलाही, मराठों ने हमला कर दिया है!” या “गुजरात हाथ से निकल गया!”, तो रंगीला शराब का घूंट लेता और कहता—
“दिल्ली अभी दूर है… जो हो रहा है होने दो, आज की शाम का मुजरा खराब नहीं होना चाहिए।”

साल 1739: जब नादिरशाह आया और रंगीला तोपें दिल्ली ही भूल गया!

बीस साल तक यह तमाशा ऐसे ही चलता रहा। लेकिन इतिहास का एक क्रूर नियम है—जब देश का राजा नाकाबिल हो, अफसर भ्रष्ट और स्वार्थी हों, और जनता सिर्फ मनोरंजन में मस्त हो, तो बाहर के लुटेरों की लार टपकने लगती है। ईरान (फारस) के खूंखार नेपोलियन कहे जाने वाले नादिरशाह की नज़र हिंदुस्तान की अकूत दौलत और दिल्ली की कमजोरी पर पड़ी।


साल 1739 में नादिरशाह एक विशाल और क्रूर सेना लेकर भारत की सीमा में घुस आया। उसने पंजाब को रौंद डाला और दिल्ली की तरफ बढ़ने लगा। अब रंगीला की नींद टूटी। उसने आनन-फानन में अपनी फौज इकट्ठी की और नादिरशाह को रोकने के लिए दिल्ली से दूर करनाल (हरियाणा) के मैदान में पहुँच गया।


यहाँ मुग़ल इतिहास का सबसे बड़ा ब्लंडर हुआ। जैसे रंगीला दरबार में आते वक्त कपड़े भूल जाता था, इस बार वह युद्ध के मैदान में मुग़ल सेना की सबसे बड़ी ताकत—शाही तोपखाना (Artillery) दिल्ली में ही भूल आया! बिना भारी तोपों के मुग़ल सेना नादिरशाह की आधुनिक और अनुशासित बंदूकधारियों के सामने ताश के पत्तों की तरह ढह गई। करनाल की जंग मात्र तीन घंटे में ख़त्म हो गई।

दिल्ली का वो भयानक कत्लेआम: जब नालियों में खून बह रहा था

हार के बाद बातचीत (Negotiation) का दौर शुरू हुआ। रंगीला ने नादिरशाह के सामने हाथ जोड़े। शुरुआत में तय हुआ कि मुग़ल बादशाह नादिरशाह को 50 लाख रुपये (या 5 लाख का हर्जाना) देगा और नादिरशाह यहीं से वापस लौट जाएगा।


लेकिन तभी मुग़ल दरबार की अंदरूनी गद्दारी सामने आई। अवध के नवाब सआदत ख़ान ने, जो अपने निजी दुश्मनों से बदला लेना चाहता था, नादिरशाह से चुपके से मुलाकात की और कहा—


“शाह सलामत, आप इतने कम पैसों में मान गए? दिल्ली चलिए, वहाँ लाल किले के भीतर अरबों की दौलत, हीरे-जवाहरात और सोना दबा पड़ा है।”

लालच में आकर नादिरशाह ने रंगीला को बंधक बनाया और मुग़ल सेना के साथ दिल्ली के लाल किले में दाखिल हो गया। शुरुआत में सब शांत था। लेकिन दिल्ली की जनता को विदेशी सैनिकों की मौजूदगी पसंद नहीं आ रही थी। बाज़ार में अफवाह फैल गई कि नादिरशाह को लाल किले के अंदर किसी महिला ने कत्ल कर दिया है।


इस अफवाह के बाद भड़की हिंसा में दिल्ली के स्थानीय लोगों ने नादिरशाह के कुछ सैनिकों को मार डाला। जब यह खबर नादिरशाह तक पहुँची, तो उसका खून खौल उठा। वह दिल्ली की प्रसिद्ध सुनहरी मस्जिद की छत पर चढ़ा, अपनी तलवार म्यान से निकाली और अपनी सेना को आदेश दिया—‘कत्ल-ए-आम्!’

नादिरशाह का शाही फरमान: "जब तक मेरी तलवार म्यान में वापस न जाए, दिल्ली के हर जिंदा इंसान का सिर धड़ से अलग कर दिया जाए।"

इसके बाद दिल्ली की सड़कों पर मौत का तांडव शुरू हुआ। सुबह से लेकर दोपहर तक मासूम बच्चों, औरतों और बुजुर्गों को सरेआम काटा गया। घरों को लूटा गया, बाज़ारों में आग लगा दी गई। इतिहासकार लिखते हैं कि उस दिन दिल्ली की नालियों में पानी नहीं, बल्कि इंसानी खून बह रहा था। लगभग 30,000 से ज्यादा लोग चंद घंटों में मार दिए गए।


जब चारों तरफ चीख-पुकार मच गई, तो गद्दार सआदत ख़ान को अपनी गलती और ग्लानि का अहसास हुआ, और उसने शर्म के मारे जहर खाकर खुदकुशी कर ली।

कोहिनूर और तख्त-ए-ताऊस की विदाई: जब रोई दिल्ली और हँसा लुटेरा

सआदत ख़ान तो मर गया, लेकिन शाह रंगीला जिंदा था। जब कत्लेआम बर्दाश्त से बाहर हो गया, तो रंगीला खुद नादिरशाह के पैरों में गिर पड़ा और रहम की भीख मांगी। नादिरशाह ने कत्लेआम तो रुकवा दिया, लेकिन इसके बदले उसने दिल्ली को पूरी तरह कंगाल कर दिया।


नादिरशाह ने लाल किले के गुप्त तहखानों से मुगलों द्वारा सदियों से इकट्ठा किया गया सारा सोना, चांदी और जवाहरात निकाल लिया। वह अपने साथ:

  • शाहजहां का बनवाया हुआ बेशकीमती तख्त-ए-ताऊस (मयूर सिंहासन) ले गया।
  • दुनिया का सबसे मशहूर हीरा कोहिनूर ले गया (जिसे रंगीला ने अपनी पगड़ी में छुपाया था, लेकिन नादिरशाह ने चालाकी से ‘पगड़ी बदल भाईचारे’ की रस्म के बहाने छीन लिया)।
  • इसके अलावा अरबों रुपये की नकदी और सिंधु नदी के पश्चिम के सारे मुग़ल इलाके हमेशा के लिए नादिरशाह के नाम कर दिए गए।

इतना सब कुछ लूटने के बाद भी रंगीला ने नादिरशाह के विदाई समारोह में कोई कमी नहीं छोड़ी। उसने यमुना नदी के किनारे नादिरशाह के लिए आलीशान झूले लगवाए, बेहतरीन शराब का इंतजाम किया और उसे बड़े ही अदब के साथ ‘टाटा, बाय-बाय’ किया।

आख़िरी दिन: अय्याशी का वो अंत जिसने इतिहास का रुख बदल दिया

नादिरशाह के जाने के बाद दिल्ली पूरी तरह से एक श्मशान बन चुकी थी। साम्राज्य की साख मिट्टी में मिल चुकी थी। कोई और स्वाभिमानी राजा होता तो शायद इस सदमे से मर जाता या बदला लेने की तैयारी करता। लेकिन हमारे रंगीला बादशाह का जिगरा अलग था। उसने कुछ दिन दुख मनाया और फिर से अपनी पुरानी दुनिया—शराब, कव्वाली और मुजरे में डूब गया।


नादिरशाह के हमले के बाद भी रंगीला पूरे 7 साल और जिया। आखिरकार, साल 1748 में, अफीम और अत्यधिक शराब के सेवा के कारण उसका शरीर पूरी तरह जर्जर हो गया और अल्लाह ने उसे अपने दरबार में बुला लिया।


जब शाह रंगीला की मौत हुई, तो उसने मुग़ल इतिहास का एक ऐसा रिकॉर्ड तोड़ दिया था जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी। मुग़ल बादशाह शासनकाल (वर्ष) बाबर 4 वर्ष हुमायूं 11 वर्ष (दो टुकड़ों में) जहांगीर 22 वर्ष शाहजहां 30 वर्ष शाह रंगीला27 वर्ष उत्तर-मुग़ल काल (Later Mughal Period) के भयानक षड्यंत्रों के बीच भी वह 27 साल तक लगातार राज कर गया, जो उसके महान पूर्वजों से भी कहीं ज्यादा था। लेकिन यह शासनकाल देश की तरक्की के लिए नहीं, बल्कि मुग़ल साम्राज्य के पतन के ताबूत में आखिरी कील साबित हुआ।

निष्कर्ष: इतिहास का वो पन्ना जिसे भुलाया मुमकिन नहीं

दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से न जाने कितने राजाओं और सुल्तानों के नाम की सलामी दी गई। कुछ को इतिहास उनके शौर्य, पराक्रम और न्याय के लिए गर्व से याद रखता है, तो कुछ को जमाना एक अजीब सी मुस्कान, अचरज और वक्र दृष्टि के साथ याद करता है।


शाह रंगीला मुग़ल इतिहास का वो ‘एंटी-हीरो’ था, जिसने जिंदगी को सिर्फ एक ‘इवेंट’ समझा। उसने कला को तो अमर कर दिया, लेकिन अपनी सल्तनत को हमेशा के लिए मार दिया।

बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्रश्न: शाह को ‘रंगीला’ क्यों कहा जाता था?
उत्तर: शाह को उनके अतरंगी मिजाज, कला, संगीत, नृत्य, महिलाओं के प्रति अत्यधिक झुकाव और चौबीसों घंटे विलासिता (अय्याशी) में डूबे रहने के कारण जनता और इतिहासकारों ने ‘रंगीला’ का तखल्लुस (उपनाम) दिया था।


प्रश्न: क्या शाह रंगीला सच में दरबार में बिना कपड़ों के आता था?
उत्तर: हाँ, समकालीन ऐतिहासिक स्रोतों और दरबारी इतिहासकारों के संस्मरणों के अनुसार, शाह रंगीला कई बार अत्यधिक नशे की हालत में बिना कपड़ों के (नग्न) ही दरबार में आ जाता था और दरबारियों को भी औरतों के कपड़े पहनने पर मजबूर करता था।


प्रश्न: आधुनिक अचकन या शेरवानी की शुरुआत किसने की थी?
उत्तर: आधुनिक अचकन (जिसका स्वरूप नेहरू जैकेट या शेरवानी जैसा है) की शुरुआत शाह रंगीला ने ही की थी। उसने मुग़ल दरबारियों के पारंपरिक ढीले और घाघरे जैसे पहनावे को बदलकर चुस्त और सीधे कट वाली अचकन को बढ़ावा दिया था।


प्रश्न: ‘सैयद ब्रदर्स’ कौन थे और रंगीला ने उन्हें कैसे खत्म किया?
उत्तर: सैयद ब्रदर्स (अब्दुल्लाह ख़ान और हुसैन अली ख़ान) 18वीं सदी के मुग़ल दरबार में बेहद शक्तिशाली वज़ीर थे जिन्हें ‘किंगमेकर’ कहा जाता था। शाह रंगीला ने खुद सीधे तौर पर बिना कोई खून बहाए, दरबार के अन्य विरोधी गुटों के साथ गुप्त गठबंधन करके चतुर कूटनीति से दोनों भाइयों को रास्ते से हटवा दिया (एक का कत्ल करवाया और दूसरे को जहर दिलवाया)।


प्रश्न: नादिरशाह ने भारत पर किस वर्ष आक्रमण किया था?
उत्तर: नादिरशाह ने साल 1739 में शाह रंगीला के शासनकाल के दौरान भारत (दिल्ली) पर आक्रमण किया था।


प्रश्न: करनाल की लड़ाई में मुग़ल सेना क्यों हार गई थी?
उत्तर: करनाल की लड़ाई (1739) में मुग़ल सेना की हार का सबसे बड़ा कारण यह था कि वे जल्दबाजी और कुप्रबंधन के चक्कर में अपनी सबसे बड़ी ताकत, यानी अपना ‘शाही तोपखाना’ (Artillery) दिल्ली में ही भूल आए थे, जिससे नादिरशाह के आधुनिक तोपखाने के सामने मुग़ल सैनिक टिक नहीं पाए।


प्रश्न: नादिरशाह भारत से कौन से दो सबसे बेशकीमती सामान लूटकर ले गया था?
उत्तर: नादिरशाह भारत से शाहजहां का बनवाया हुआ रत्नों से जड़ित ‘तख्त-ए-ताऊस’ (मयूर सिंहासन) और दुनिया का सबसे कीमती हीरा ‘कोहिनूर’ लूटकर अपने साथ ले गया था।


प्रश्न: कोहिनूर हीरा नादिरशाह ने रंगीला से कैसे छीना था?
उत्तर: रंगीला ने कोहिनूर हीरे को अपनी पगड़ी के अंदर छुपा कर रखा था। नादिरशाह को जब यह बात पता चली, तो उसने कूटनीतिक चालाकी दिखाते हुए एक जश्न के दौरान रंगीला से ‘पगड़ी बदल भाईचारे’ की रस्म निभाने को कहा। मुग़ल शिष्टाचार के कारण रंगीला मना नहीं कर सका और इस तरह कोहिनूर नादिरशाह के पास चला गया।


प्रश्न: शाह रंगीला ने कुल कितने वर्षों तक शासन किया?
उत्तर: शाह रंगीला ने कुल 27 वर्षों (1719 से 1748) तक शासन किया, जो कि उत्तर-मुग़ल काल के किसी भी अन्य बादशाह की तुलना में सबसे लंबा कार्यकाल था।


प्रश्न: रंगीला के दौर में भारतीय संगीत में क्या बड़े बदलाव हुए?
उत्तर: रंगीला के दौर में शास्त्रीय संगीत की ‘ख्याल गायकी’ को बहुत बढ़ावा मिला। उसके दरबारी संगीतकार सदारंग और अदारंग ने संगीत को नए आयाम दिए। इसी दौर में सूफी कव्वाली लाल किले का हिस्सा बनी और उर्दू भाषा को शाही संरक्षण मिला।

📢 इसे शेयर करें, कमेंट करें और सपोर्ट करें!

आपको शाह रंगीला की यह अतरंगी और सनसनीखेज कहानी कैसी लगी? क्या आप मुग़ल इतिहास के इस छुपे हुए पन्ने के बारे में पहले से जानते थे?

  • 💬 कमेंट बॉक्स में अपनी राय ज़रूर दें: आपको रंगीला की कौन सी आदत सबसे ज्यादा ‘क्रेजी’ लगी? नीचे कमेंट करके हमें बताएं!
  • 📱 दोस्तों के साथ शेयर करें: इतिहास के इस मजेदार और अनोखे किस्से को अपने WhatsApp groups, Facebook और Twitter (X) पर दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें ताकि युवाओं को भी पता चले कि असली ‘नाइटलाइफ़’ का गॉडफ़ादर कौन था!
  • ☕ हमें सपोर्ट करें (Donate): यदि आपको हमारा यह गहन रिसर्च और कंटेंट पसंद आया है, तो आप हमारी वेबसाइट को और बेहतर बनाने और ऐसे ही अनसुने ऐतिहासिक किस्से सामने लाने के लिए हमें छोटा सा योगदान (Donate) दे सकते हैं। आपके द्वारा दिया गया सपोर्ट हमें स्वतंत्र लेखन जारी रखने की ताकत देता है। [यहाँ क्लिक करके डोनेट करें]

नूर पोस्ट का व्हाट्सएप ग्रुप ज्वाइन करें
टैग :इतिहास
शेयर करें :
Facebook Pinterest Whatsapp Whatsapp
◈  इस पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया दें :
Proud0
Happy0
Love0
Surprise0
Sad0
Angry0
एо अहमद
लेखकएо अहमद
Founder and Editor
Follow:
मैं आफताब अहमद इस साइट पर एक लेखक हूं, मुझे विभिन्न शैलियों और विषयों पर लिखना पसंद है। मुझे ऐसा निबंध और ब्लॉग लिखना अच्छा लगता है जो मेरे पाठकों को चिंतन और प्रेरणा देती हैं।
कमेंट करें! कमेंट करें!

कमेंट करें! Cancel reply

You must be logged in to post a comment.

हमें फॉलो करें >>

FacebookLike
XFollow
InstagramFollow
YoutubeSubscribe

सबसे अधिक पढ़ी गईं >>

बच्चों को नमाज़ की आदत डालने के 4 मजेदार और आसान तरीके

5 मिनट में पढ़ें
334 लोगों ने देखा

मौलाना शौकत अली: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक और एकता के प्रतीक

18 मिनट में पढ़ें
22 लोगों ने देखा

बरमूडा ट्रायंगल का रहस्य: सच्चाई और रोचक कहानियों का विस्तृत विश्लेषण

15 मिनट में पढ़ें
329 लोगों ने देखा

किताब-उल-हिन्द: भारत के इतिहास और संस्कृति का एक ऐतिहासिक दस्तावेज

11 मिनट में पढ़ें
32 लोगों ने देखा
Aruna Asaf Ali.

स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला भड़काने वाली अरुणा आसफ अली

12 मिनट में पढ़ें
59 लोगों ने देखा
draculas-real-story-in-hindi

कौन था ड्रैकुला? एर्तुग़रुल से क्या था ड्रेकुला का कनेक्शन?

7 मिनट में पढ़ें
119 लोगों ने देखा

कटहल के बीज: पोषण का खजाना और अपार संभावनाओं वाला खाद्य पदार्थ

12 मिनट में पढ़ें
75 लोगों ने देखा

वाजिद अली शाह: अवध की जनता के प्यारे नवाब या अयोग्य शासक?

9 मिनट में पढ़ें
22 लोगों ने देखा
shahad-quran-madhumakkhi-science

वैज्ञानिकों ने मधुमक्खी के बारे में जो खोज अब किया वह कुरान में 1400 साल पहले ही लिख दी गई थी।

8 मिनट में पढ़ें
40 लोगों ने देखा

🥃 इस्लाम में शराब क्यों हराम है? एक विस्तृत विश्लेषण।

17 मिनट में पढ़ें
292 लोगों ने देखा

आज का अनमोल विचार 1 / 5
लेखक

–
अन्य विचार

सम्बंधित टॉपिक >>

Ibn-sinna-Avicenna

मेडिकल साइंस के जनक – इब्न सीना, जिनका इतिहास छुपा दिया गया

5 मिनट में पढ़ें
191 लोगों ने देखा
maulana abdul kalam azad

मदरसे के छात्र मौलाना अबुल कलाम आजाद की बरसी पर मनाया जाता है – राष्ट्रीय शिक्षा दिवस

1 मिनट में पढ़ें
175 लोगों ने देखा

पाकिस्तान को परमाणु बम बनाने से इजरायल क्यों नहीं रोक सका?

11 मिनट में पढ़ें
110 लोगों ने देखा

इस्लामी कैलेंडर की शुरूवात कब और कैसे हुई ? मुहर्रम का महीना इस्लामी कैलेंडर का पहला महीना कैसे बना ?

7 मिनट में पढ़ें
2K लोगों ने देखा

महत्वपूर्ण लिंक्स

  • सहेजी गई पोस्ट
  • आपके लिए
  • पढ़े गए पोस्ट
  • पसंदीदा टॉपिक्स
  • मेरी प्रोफाइल
  • हमारे बारे में
  • हमारी सहायता करें
  • हमे विज्ञापन दें
  • भविष्य योजना
  • साइट के लेखक
  • संपर्क करें
  • गोपनीयता नीति
  • अस्वीकरण
  • सेवा की शर्तें
  • सुधार नीति

All content © NoorPost


Video
Quiz
Home
Tools
More

Quiz Categories

General Knowledge Test IQ Islamic Quiz Science History Fun Quiz

Tools & Utilities

Age Calc Converter QR Gen BMI Calc Search Love Calc Wishes

Explore More

About Us Donate Us Privacy Terms Contact Advertise Correction Disclaimer Future Plan Writers

Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

क्या पासवर्ड भूल गए?

Not a member? Sign Up