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> इतिहास > स्वतंत्रता सेनानी > असली वीर तो शेर अली आफ़रीदी थे, जिन्होंने अंडमान जेल में रहते हुए अंग्रेज वायसराय को मारा।

असली वीर तो शेर अली आफ़रीदी थे, जिन्होंने अंडमान जेल में रहते हुए अंग्रेज वायसराय को मारा।

एо अहमद
एо अहमद
एо अहमद
लेखकएо अहमद
Founder and Editor
मैं आफताब अहमद इस साइट पर एक लेखक हूं, मुझे विभिन्न शैलियों और विषयों पर लिखना पसंद है। मुझे ऐसा निबंध और ब्लॉग लिखना अच्छा लगता...
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Published: 29/06/2025
11 लोगों ने देखा
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9 मिनट में पढ़ें

आज हम आपको एक ऐसे नायक की कहानी सुनाने जा रहे हैं, जिनका नाम इतिहास के पन्नों में भले ही ज्यादा न चमकता हो, लेकिन उनकी बहादुरी और देशभक्ति की मिसाल आज भी हमें प्रेरित करती है। यह कहानी है शेर अली आफ़रीदी की, जिन्हें शेरे अली के नाम से भी जाना जाता है। एक ऐसा शख्स, जिसने अपनी जिंदगी में नाइंसाफी, यातनाओं और अंग्रेजों के जुल्म को सहा, फिर भी अपने देश के लिए कुछ बड़ा करने का जज्बा नहीं छोड़ा। आइए, इस गुमनाम स्वतंत्रता सेनानी की कहानी को विस्तार से जानते हैं, जो युवा दिलों में जोश और प्रेरणा जगा सकती है।

हाईलाइट्स
  • शेर अली का शुरुआती जीवन: वफादारी से विद्रोह तक
  • कालापानी: यातनाओं का अंधेरा
  • चतुराई और धैर्य: शेर अली की रणनीति
  • लॉर्ड मेयो का अंडमान दौरा: एक ऐतिहासिक मोड़
  • 8 फरवरी 1872: वह ऐतिहासिक दिन
  • शेर अली का बलिदान
  • शेर अली की विरासत

शेर अली का शुरुआती जीवन: वफादारी से विद्रोह तक

शेर अली आफ़रीदी का जन्म 19वीं सदी में हुआ था। वह एक पठान योद्धा थे, जिनमें शुरू से ही साहस और निष्ठा कूट-कूटकर भरी थी। 1860 के दशक में उन्होंने ब्रिटिश प्रशासन के लिए पंजाब घुड़सवार पुलिस में काम किया। इससे पहले, वह 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान अंबाला में घुड़सवार सेना रेजिमेंट और रोहिलखंड व अवध में प्रेसीडेंसी सेनाओं में अपनी सेवाएं दे चुके थे। उनकी बहादुरी और समर्पण के लिए मेजर ह्यूग जेम्स ने उन्हें प्रमाण पत्र से सम्मानित किया था, और रेन टेलर ने उन्हें एक घोड़ा और पिस्तौल भेंट की थी। उस समय शेर अली पूरी तरह से ब्रिटिश शासन के प्रति वफादार थे।

लेकिन जिंदगी ने उनके लिए कुछ और ही लिखा था। एक रिश्तेदार की हत्या के झूठे आरोप में उन्हें फंसाया गया। उनकी वफादारी और निष्ठा का कोई फायदा नहीं हुआ। उन्हें पहले मौत की सजा सुनाई गई, लेकिन अपील के बाद 2 अप्रैल 1867 को इसे आजीवन कारावास में बदल दिया गया। इसके बाद, शेर अली को अंडमान निकोबार की कुख्यात कालापानी जेल में भेज दिया गया।


कालापानी: यातनाओं का अंधेरा

अंडमान निकोबार की कालापानी जेल उस समय स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक नर्क थी। चारों तरफ समुद्र से घिरी इस जेल में कैदियों को अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं। उन्हें हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़कर रखा जाता था। हर कैदी को रोजाना 30 पाउंड नारियल और सरसों का तेल निकालने का कठिन काम करना पड़ता था। अगर कोई काम करने से मना करता या विरोध करता, तो उसे बेरहमी से पीटा जाता था। सड़ा हुआ खाना, गंदा पानी, और बीमारियां कैदियों की जिंदगी का हिस्सा थीं। यह जेल न केवल शरीर को तोड़ती थी, बल्कि आत्मा को भी कुचलने की कोशिश करती थी।

शेर अली ने इस जेल में कैदियों के साथ होने वाले क्रूर व्यवहार को अपनी आंखों से देखा। उनके दिल में अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा और विद्रोह की चिंगारी भड़क उठी। उन्होंने ठान लिया कि वह भारत की आजादी के लिए कुछ बड़ा करेंगे। लेकिन यह आसान नहीं था। जेल में हर कदम पर निगरानी थी, और हथियार तो दूर, कैदियों को अपनी बात कहने की आजादी भी नहीं थी। फिर भी, शेर अली ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने एक चतुर योजना बनाई।


चतुराई और धैर्य: शेर अली की रणनीति

शेर अली ने सबसे पहले अंग्रेज अधिकारियों का भरोसा जीतने का फैसला किया। उन्होंने अपनी उग्रता को छिपाया और जेल के अंग्रेज अफसरों के सामने अच्छा व्यवहार दिखाना शुरू किया। उनकी इस चतुराई ने काम किया। जल्द ही, उन्हें जेल में नाई का काम सौंपा गया। नाई के रूप में, वह सभी कैदियों और अधिकारियों के बाल काटता था। इस दौरान वह भारतीय कैदियों से गुप्त रूप से बात करता और उन्हें बताता कि वह जल्द ही एक बड़ा कारनामा करने वाला है।

उनका असली मकसद था ब्रिटिश हुकूमत को एक बड़ा झटका देना। और मौका आया, जब भारत के चौथे वायसराय, लॉर्ड मेयो (रिचर्ड साउथवेल बॉर्के), को अंडमान की जेल का निरीक्षण करने के लिए आमंत्रित किया गया।


लॉर्ड मेयो का अंडमान दौरा: एक ऐतिहासिक मोड़

लॉर्ड मेयो ब्रिटिश भारत के सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक थे। वह एक उत्साही यात्री थे और अंडमान की जेल का दौरा उनके लिए एक अनोखा अवसर था। 24 जनवरी 1872 को, लॉर्ड मेयो अपनी पत्नी लेडी मेयो, राजनयिकों, और भारी सुरक्षा बल के साथ कलकत्ता से रंगून होते हुए अंडमान के लिए रवाना हुए। 8 फरवरी 1872 को उनका कारवां पोर्ट ब्लेयर पहुंचा।

उस समय अंडमान की कॉलोनी में करीब 8000 लोग थे, जिनमें 7000 पुरुष कैदी, 900 महिलाएं, और 200 पुलिसकर्मी शामिल थे। लॉर्ड मेयो ने जेल का निरीक्षण किया और फिर माउंट हैरियट पर जाने का फैसला किया, ताकि वहां सूर्यास्त का नजारा देख सकें और दोषियों के लिए एक सेनेटोरियम की संभावना तलाश सकें।

शेर अली के लिए यह मौका सुनहरा था। वह कई दिनों से वायसराय के दौरे की खबर से उत्साहित होने का नाटक कर रहे थे, ताकि अंग्रेजों को कोई शक न हो। लेकिन उन्हें रॉस द्वीप, जहां लॉर्ड मेयो ठहरे थे, तक पहुंचने की इजाजत नहीं मिली। फिर भी, शेर अली ने हार नहीं मानी।


8 फरवरी 1872: वह ऐतिहासिक दिन

8 फरवरी की शाम को, लॉर्ड मेयो माउंट हैरियट से लौट रहे थे। अंधेरा छा चुका था, और वह 12 गार्डों की सुरक्षा में थे। लेडी मेयो अपने पति की वापसी का इंतजार कर रही थीं और उन्होंने बैंड को स्वागत में बजाने का आदेश दिया। जैसे ही लॉर्ड मेयो घाट की सीढ़ियों से नीचे उतर रहे थे, शेर अली, जो एक झाड़ी में छिपे थे, ने बिजली की गति से हमला किया। उनके पास कोई बंदूक या तलवार नहीं थी—सिर्फ एक नाई का चाकू। लेकिन उनकी हिम्मत और जज्बे ने उस चाकू को एक शक्तिशाली हथियार बना दिया।

शेर अली ने लॉर्ड मेयो पर हमला किया और कुछ ही पलों में उनका काम तमाम कर दिया। समुद्र के किनारे, जंगल की छांव, ढोल की आवाज, और मशालों के बीच हंगामा मच गया। शेर अली के पास भागने का मौका था, लेकिन वह शांत खड़े रहे। उन्होंने वह कर दिखाया था, जो उनका मकसद था। लॉर्ड मेयो को बचाने की कोशिश की गई, लेकिन अत्यधिक खून बहने के कारण उनकी मृत्यु हो गई।


शेर अली का बलिदान

शेर अली की इस बहादुरी ने ब्रिटिश हुकूमत में हड़कंप मचा दिया। एक साधारण कैदी, जिसके पास सिर्फ एक चाकू था, ने ब्रिटिश भारत के सबसे ताकतवर व्यक्ति को मार गिराया। यह कोई साधारण घटना नहीं थी। लॉर्ड मेयो का पद उस समय के प्रधानमंत्री के बराबर था, और उनकी सुरक्षा में कोई कमी नहीं थी। फिर भी, शेर अली की चतुराई, धैर्य, और देशभक्ति ने असंभव को संभव कर दिखाया।

शेर अली ने कहा कि उन्होंने यह काम अल्लाह के निर्देश पर किया, और उनका साथी सिर्फ अल्लाह था। लेकिन ब्रिटिश हुकूमत इस घटना को दबाना चाहती थी। इसलिए, जल्दबाजी में और चुपके से, 11 मार्च 1872 को शेर अली को वाइपर आइलैंड पर फांसी दे दी गई। उनकी शहादत गुमनाम रही, लेकिन इसने स्वतंत्रता संग्राम में एक नई चिंगारी पैदा की।


शेर अली की विरासत

शेर अली आफ़रीदी की कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची देशभक्ति और हिम्मत के सामने कोई बाधा बड़ी नहीं होती। उनके पास न तो हथियार थे, न ही कोई बड़ा समर्थन, फिर भी उन्होंने अपने जज्बे और चतुराई से इतिहास रच दिया। वह एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिनमें भगत सिंह की तरह प्रतिबद्धता और आजाद की तरह जोश था।

आज के युवाओं के लिए शेर अली की कहानी एक प्रेरणा है। यह हमें बताती है कि अगर दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो, तो संसाधनों की कमी या मुश्किल हालात आपको रोक नहीं सकते। शेर अली ने अपने बलिदान से यह दिखाया कि आजादी की लड़ाई में हर छोटा-बड़ा योगदान मायने रखता है।

तो आइए, हम इस गुमनाम नायक को याद करें और उनके बलिदान को सलाम करें। उनकी कहानी को अपने दोस्तों के साथ शेयर करें, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इस वीर पठान की बहादुरी को जान सकें। शेर अली आफ़रीदी—एक सच्चा स्वतंत्रता सेनानी, जिसका नाम हमेशा अमर रहेगा!

#स्वतंत्रता_संग्राम #शेर_अली_आफ़रीदी #भारत_की_आजादी #कालापानी #देशभक्ति

टैग :इतिहासमुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी
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एо अहमद
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