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> इतिहास > मुस्लिम वैज्ञानिक > वक़ार ज़िया जिन्होंने दिलाई यूट्यूब, टिक-टॉक, वीडियो स्ट्रीमिंग में होने वाली बफरिंग से निजात

वक़ार ज़िया जिन्होंने दिलाई यूट्यूब, टिक-टॉक, वीडियो स्ट्रीमिंग में होने वाली बफरिंग से निजात

एо अहमद
एо अहमद
एо अहमद
लेखकएо अहमद
Founder and Editor
मैं आफताब अहमद इस साइट पर एक लेखक हूं, मुझे विभिन्न शैलियों और विषयों पर लिखना पसंद है। मुझे ऐसा निबंध और ब्लॉग लिखना अच्छा लगता...
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Published: 22/08/2024
66 लोगों ने देखा
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4 मिनट में पढ़ें

वक़ार ज़िया ने जिस प्रोजेक्ट पर काम किया यह वह प्रोजेक्ट था, जिसने वीडियो स्ट्रीमिंग की दुनिया में क्रांति ला दी यानी चाहे आप टिक-टॉक पर कोई वीडियो देखें, ज़ूम पर वीडियो कॉल करें, या यूट्यूब पर लेक्चर सुनें और वीडियो देखें, इस शोध ने यह सब करना बहुत सुकून वाला बना दिया।

पहले इंटरनेट की रफ़्तार में उतार-चढ़ाव होने पर वीडियो चलते-चलते रुक जाया करते थे। बफ़रिंग काफ़ी बदनाम शब्द हुआ करता था। कोई वीडियो चलने भी लगता तो उसकी क्वालिटी उतनी अच्छी नहीं होती।

हाईलाइट्स
  • वक़ार ज़िया की शैक्षिक पृष्ठभूमि-
  • इंजीनियरों ने वीडियो स्ट्रीमिंग तेज़ कैसे बनाई?

इसके हल के लिए 2009 में गूगल, माइक्रोसॉफ़्ट, एपल, नेटफ़्लिक्स, एलजी, क्वालकॉम और दूसरी बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों ने मिलकर वीडियो स्ट्रीमिंग में नए मापदंडों पर काम करना शुरू कर दिया। इस पहल के नतीजे साल 2012 में सामने आए।

वकार जिया ने इंजीनियरों की उस टीम के साथ काम किया था जिसने दुनिया में उपभोक्ताओं के लिए वीडियो स्ट्रीमिंग को आसान और तेज़ बनाया। इस प्रोजेक्ट का नाम था ‘डेश’।

आज ‘डेश’ की बदौलत स्टैंडर्ड इंटरनेट पर ऑन डिमांड वीडियो और लाइव स्ट्रीमिंग की क्वालिटी बहुत अच्छा हो चुका है।

वक़ार ज़िया की शैक्षिक पृष्ठभूमि-

जब उन्होंने 1996 में यूनिवर्सिटी ऑफ़ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (यूईटी), तक्षशिला में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में दाख़िला लिया तो उस समय उनके घर में कोई कंप्यूटर नहीं था।

वह बीबीसी को बताते हैं कि उस दौर में कंप्यूटर और सॉफ़्टवेयर से संबंधित यूनिवर्सिटी में भी संसाधनों की कमी होती थी. वक़ार बताते हैं, “हमारे यूनिवर्सिटी में होते हुए वहां एक कंप्यूटर लैब बनाई गई और आख़िरी साल में हमें कंप्यूटर प्रोग्रामिंग का अनुभव मिला।”

हमारे काम को इतने वर्षों तक कोई सम्मान नहीं मिला था, मैंने यह फ़ील्ड और नौकरी छोड़ दी थी मगर जब पुराने दोस्तों ने अवॉर्ड के बारे में बताया तो मैं हैरान रह गया।

यूनिवर्सिटी के आख़िरी साल के दौरान उनकी सॉफ़्टवेयर प्रोग्रामिंग में दिलचस्पी बढ़ी जिसके बाद उन्होंने जर्मनी में इनफ़ॉर्मेशन एंड कम्यूनिकेशन सिस्टम में पोस्ट ग्रेजुएशन किया।

वक़ार ज़िया बताते हैं, “पीएचडी के बाद एक प्रोफ़ेसर ने बताया कि ऐसी वीडियो स्ट्रीमिंग लाने पर काम हो रहा है जो लोडिंग या बफ़रिंग में अधिक समय न लगाए क्योंकि इंटरनेट की गति ऊपर नीचे होने से वीडियो अटक जाते हैं।”

उसके बाद इंटरनेट की बड़ी कंपनियों के विशेषज्ञों की एक टीम ने ‘डेश’ नाम की टेक्नोलॉजी पर काम शुरू कर दिया था। वक़ार ज़िया भी उस टीम का हिस्सा बने।

इंजीनियरों ने वीडियो स्ट्रीमिंग तेज़ कैसे बनाई?

वक़ार बताते हैं कि बुनियादी तौर पर वीडियो स्ट्रीमिंग तेज़ बनाने के लिए सोच में काफी बदलाव लाया गया।

उनके अनुसार, “पहले सर्वर स्ट्रीमिंग के लिए वीडियो रिसीवर की तरफ़ धकेलता था। इसमें यह मुश्किल होती थी कि राउटर उस ट्रांसफ़र को ब्लॉक कर देते थे जबकि सर्वर को यह मालूम नहीं होता था कि वीडियो चलाने वाले डिवाइस के पास इंटरनेट की स्पीड कैसी है।”

“हमने इस को उलट दिया. बजाय इसके कि सर्वर रिसीवर को वीडियो भेजे हमने तय किया कि रिसीवर सर्वर से वीडियो खींचेगा। इस तरह रिसीवर को मालूम होगा कि डाउनलोडिंग की कितनी क्षमता मौजूद है और राउटर उसे ब्लॉक नहीं करेगा”

वक़ार ज़िया बताते हैं कि ‘डेश’ टेक्नोलॉजी से वीडियो कंप्रेशन की क्षमता भी बढ़ी जो अधिक से अधिक वीडियो व ऑडियो स्टैंडर्ड को सपोर्ट करती थी।

सन् 2010 से 2020 के दौरान वक़ार जिया बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के साथ अडेप्टिव स्ट्रीमिंग पर रिसर्च में काम करते रहे हैं और आजकल वह जर्मनी में टेक्नोलॉजी कंपनी एपल में बतौर स्टैंडर्ड लीड काम कर रहे हैं।

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एо अहमद
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मैं आफताब अहमद इस साइट पर एक लेखक हूं, मुझे विभिन्न शैलियों और विषयों पर लिखना पसंद है। मुझे ऐसा निबंध और ब्लॉग लिखना अच्छा लगता है जो मेरे पाठकों को चिंतन और प्रेरणा देती हैं।
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