तरावीह पारा-1
1- सूरह अल-फ़ातिहा
अल्लाह की हम्द (प्रशंसा/तारीफ़) बयान करो, उसी की इबादत (पूजा/भक्ति) करो, उसी से मदद मांगो, सीधे रास्ते पर चलो, उन के रास्ते पर चलो जिन पर अल्लाह ने ईनाम किया है, उनके रास्ते पर न चलो जिनसे अल्लाह नाराज़ हो गया और जो गुमराह (भटके हुए) हो गए।
2-सूरह अल-बक़रा
जिस किताब का इंतज़ार था वह आ गई है। इस किताब को रहनुमाई (मार्गदर्शन) करने वाली किताब बनाओ। तक़वा (परहेज़गारी/ईश्वर का डर) इख़्तियार (अपनाना) करो। ग़ैब (अदृश्य/जो दिखाई न दे) में रहते हुए ईमान लाओ। नमाज़ क़ायम (स्थापित) करो। अल्लाह की राह में ख़र्च करो। कुरआन पर और पिछली सारी किताबों पर ईमान लाओ और आख़िरत (परलोक/मृत्यु के बाद का जीवन) पर यक़ीन रखो।
ज़मीन में फ़साद (दंगा/अशांति) बरपा (पैदा) न करो। ज़मीन को संवारने का काम करो। हिदायत (सही रास्ता) के बदले गुमराही का सौदा मत करो। अल्लाह की इबादत करो, उस पर ईमान लाओ और अच्छे काम करो।
अल्लाह से किये हुए अहद (वादे) को मत तोड़ो। अल्लाह ने जिसे जोड़ने का हुक्म दिया है उसे जोड़ो। यह ज़मीन तुम्हारे लिए बनाई गई है। इस ज़मीन का इक़्तेदार (अधिकार/शासन) दे कर तुमको ख़लीफ़ा (प्रतिनिधि) बनाया गया है। तुम उस ख़िलाफत (प्रतिनिधित्व) का हक़ अदा करो। इस ज़मीन में फ़साद मत फैलाओ। ख़ून-खराबा मत करो। शैतान से होशियार रहो, कभी बहका दे तो फ़ौरन तौबा (क्षमा/प्रायश्चित) करो।
अल्लाह की नेमतों (वरदानों) को याद करो, अल्लाह के साथ किए हुए अहद को पूरा करो, अल्लाह से डरो, अल्लाह की किताब पर ईमान लाओ और अल्लाह की आयतों (कथनों/छंदों) का सौदा मत करो। अल्लाह की नाराज़गी से बचो, हक़ (सत्य) को बातिल (असत्य/झूठ) से अलग रखो, हक़ का एलान करते रहो। नमाज़ क़ायम करो, जकात (दान) दो और झुकने वालों के साथ अल्लाह के आगे झुक जाओ। लोगों को भलाई का हुक्म दो, अपने आप को हरगिज़ मत भूलो और ख़ुद भी भलाई पर अमल (पालन) करते रहो, सब्र (धैर्य) और नमाज़ से मदद हासिल करो और इसके लिए अपनी ज़िंदगी में अल्लाह का ख़ौफ़ पैदा करो। हमेशा ज़ेहन (दिमाग/मन) में ताज़ा रखो कि रब से मुलाक़ात करनी है और उसकी तरफ़ पलट कर जाना है, उस रोज़ के अंजाम की फ़िक्र करो जब कोई किसी के काम नहीं आएगा और किसी की सिफ़ारिश (अनुशंसा) क़ुबूल (स्वीकार) नहीं की जाएगी, किसी से फ़िदया (जुर्माना/बदला) नहीं लिया जाएगा और किसी की किसी से मदद न हो पाएगी।
बनी इस्राईल की रूदाद (कहानी/वृत्तांत) ग़ौर से पढ़ो। उनके अंजाम से इबरत (शिक्षा/चेतावनी) हासिल करो। उन्होंने अल्लाह की नेमतों की नाशुक्री की तुम ऐसा मत करना। उन्होंने अल्लाह की आयतों का मज़ाक़ उड़ाया- तुम ऐसा मत करना। उन्होंने अल्लाह की शरीयत (धार्मिक नियम) को पामाल (नष्ट/उल्लंघन) किया- तुम ऐसा मत करना। उन्होंने अल्लाह से किया हुआ हर वादा तोड़ा – तुम ऐसा मत करना।
बंदगी (सेवा/पूजा) सिर्फ़ अल्लाह की करो। माँ-बाप के साथ बेहतरीन सुलूक (व्यवहार) करो, रिश्तेदारों, यतीमों, मिस्कीनों (गरीबों/जरूरतमंदों) का बहुत ख़याल रखो और नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो।
एक-दूसरे का ख़ून मत बहाओ, एक-दूसरे को बेघर मत करो, एक दूसरे की हक़-तलफ़ी (अधिकार छीनना) और एक-दूसरे के साथ ज्यादती (अन्याय) मत करो। अल्लाह की पूरी किताब पर ईमान लाओ अल्लाह की शरीयत को मज़बूती से पकड़ लो।
जादू और उस जैसे कुफ़्र (अधर्म/ईश्वर का इनकार) के सब कामों से बचो। अल्लाह की आयतों का ग़लत इस्तेमाल मत करो। ऐसे काम मत करो जिन से तुम्हें या लोगों को नुकसान पहुंचे। शौहर और बीवी के रिश्ते की हिफ़ाज़त करो और उसमें दराड़ (दरार/फूट) मत डालो। अल्लाह की किताब से इस तरह रिश्ता कायम करो जिस तरह उस का हक़ है।
नमाज़ क़ायम करो और ज़कात दो और अपनी आखिरत के लिए अच्छे आमाल (कर्म) आगे भेजते रहो।
झूठी उम्मीदें मत बांधो, अपने आप को अल्लाह के आगे झुक सा दो और बेहतरीन कामों से ज़िंदगी को सजाओ। अल्लाह की मस्जिदों में अल्लाह के ज़िक्र से रोकना और अल्लाह की मस्जिदें वीरान करना बहुत बड़ा ज़ुल्म है। इस तरह के जुल्म से बहुत दूर रहो।
दूसरों की ख़्वाहिशों (इच्छाओं) की पैरवी (अनुसरण) मत करो। अल्लाह की हिदायत की कद्र करो। अल्लाह की किताब की ख़ूब अच्छी तरह तिलावत (पाठ) करो जैसा कि उसकी तिलावत करने का हक़ है।
इब्राहीम तुम सब के इमाम (नेता/मार्गदर्शक) हैं। उनके अज़ीम (महान) नमूने से अपनी ज़िंदगी को रोशन करो। ज़ुल्म से बचो, इब्राहीम की सरगर्मियों (गतिविधियों) का मरकज़ (केंद्र) ख़ाना-ए-काबा था। तुम उसे अपनी मस्जिद बनाओ। ख़ाना-ए-काबा और हर मस्जिद की पाकीज़गी और सफ़ाई का ख़याल रखो।
अल्लाह के फ़रमाँबरदार (आज्ञाकारी) बन जाओ। अपनी क़ुरबानगाहें (बलिदान का स्थान) तलाश करो। अल्लाह की रहमत के तलबगार (इच्छुक) बन जाओ। अल्लाह के रसूल के मिशन (लक्ष्य) के अलमबरदार (ध्वजवाहक/नेतृत्व करने वाले) बन कर क़ुरआन की आयतें सुनाओ। किताब और हिकमत (बुद्धिमानी/ज्ञान) की तालीम हासिल करो और लोगों तक भी इस तालीम को पहुंचाओ। अपना तज़किया (शुद्धिकरण/आत्म-सुधार) करो और लोगों का तज़किया करो। इब्राहीम के रास्ते को ख़ुशदिली से इख़्तियार (अपनाना) करो। वह रास्ता यह है कि अपने आप को पूरे का पूरा रब्बुल-आलमीन (संसार का स्वामी) के हवाले कर दो।
खुद भी सच्चे मुस्लिम (ख़ुदा का सच्चा फ़रमाँबरदार) बनो और अपने बच्चों को सच्चा मुस्लिम बनाने की सारी कोशिशें ज़िंदगी भर करते रहो। अपने सिलसिले में फ़ैसला करो कि तुम्हें मौत न आए मगर इस्लाम की हालत में और बच्चों को भी मरते दम तक इसी की नसीहत करते रहो। अपने बच्चों के दिलों में दीन की मुहब्बत कूट-कूट कर भर दो।
बहुत से लोग दावा करेंगे कि उनका रास्ता ही हिदायत का रास्ता है, मगर तुम तो बस इब्राहीम का रास्ता इख़्तियार करो, वह हनीफ़ (एकेश्वरवादी) और यकसू (एकाग्र/एकनिष्ठ) थे।
सारे नबियों का रास्ता इस्लाम का रास्ता था तुम भी इसी रास्ते को इख़्तियार करो। सारी आसमानी किताबों पर ईमान लाओ और उनके दरमियान कोई फर्क न करो। अपने मुस्लिम होने का ऐलान करो। इस तरह ईमान लाओ जिस तरह सच्चे मोमिन (आस्थावान/विश्वासी) अल्लाह के रसूल पर ईमान लाए। यह अल्लाह का रंग है इसे इख़्तियार करो। इससे अच्छा कोई रंग नहीं है इसलिए इसके अलावा हर रंग से बेज़ारी (नफ़रत/विमुखता) का एलान कर दो।
यहूदियों व ईसाईयों का रास्ता मत इख़्तियार करो। तुम्हें जो रास्ता दिखाया है उस पर इतमिनान के साथ चलते रहो। तुम्हें अपने आमाल का जवाब देना है और अपनी कमाई पेश करनी है।
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अल्लाह के कलाम (संदेश) को दूसरों तक पहुँचाना सदक़ा-ए-जारिया (निरंतर मिलने वाला पुण्य) है। हो सकता है कि आपके एक शेयर से किसी भटके हुए को हिदायत मिल जाए या किसी का ईमान ताज़ा हो जाए।
भलाई की राह दिखाने वाले को भी उतना ही सवाब (पुण्य) मिलता है, जितना उस पर अमल करने वाले को।
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