By using this site, you agree to the Privacy Policy and Terms of Use.
Accept
NoorPostNoorPost
  • होम
  • न्यूज़
    • राष्ट्रीय
    • अंतरराष्ट्रीय
    • मुस्लिम दुनिया
  • इतिहास
    • मुस्लिम वैज्ञानिक
    • सामाजिक कार्यकर्ता
    • स्वतंत्रता सेनानी
    • उस्मानी साम्राज्य
    • जीवनी
  • वीडियो
  • ब्लॉग
  • मजहब
  • अन्य
    • खान-पान
    • स्वास्थ्य
    • शिक्षा
    • रोजगार
    • साइंस-टेक्नोलॉजी
      • मोबाइल
Sign In
नोटिफिकेशन और दिखाएं
Font Resizerआ
Font Resizerआ
NoorPostNoorPost
  • अंतरराष्ट्रीय
  • राष्ट्रीय
  • मुस्लिम दुनिया
  • इतिहास
  • खान-पान
  • ब्लॉग
  • मजहब
  • रोजगार
  • वीडियो
  • शिक्षा
  • साइंस-टेक्नोलॉजी
  • सोशल मीडिया
  • स्वास्थ्य
Search
  • प्रमुख पेज
    • होम
    • संपर्क करें
    • गोपनीयता नीति
    • अस्वीकरण
    • सर्च करें
  • मेरी चीजें
    • सुरक्षित पोस्ट
    • मेरे लिए
    • पढ़े गए पोस्ट
    • पसंदीदा टॉपिक्स
    • पसंदीदा लेखक/लेखिका
  • Categories
    • मुस्लिम दुनिया
    • राष्ट्रीय
    • अंतरराष्ट्रीय
    • इतिहास
    • खान-पान
    • ब्लॉग
    • मजहब
    • शिक्षा
    • स्वास्थ्य
    • रोजगार
    • वीडियो
    • साइंस-टेक्नोलॉजी
    • सोशल मीडिया
Sign In Sign In
Follow US
> इतिहास > स्वतंत्रता सेनानी > इंकलाब जिंदाबाद का नारा देने वाले क्रांतिकारी: मौलाना हसरत मोहानी

इंकलाब जिंदाबाद का नारा देने वाले क्रांतिकारी: मौलाना हसरत मोहानी

मौलाना हसरत मोहानी: वो शायर जिसने 'इंकलाब ज़िंदाबाद' का नारा दिया और 'पूर्ण स्वराज' की मांग की। पढ़ें उनकी ज़िंदगी, शायरी और आज़ादी के लिए बेमिसाल संघर्ष की गौरव गाथा।
एо अहमद
एо अहमद
एо अहमद
लेखकएо अहमद
Founder and Editor
मैं आफताब अहमद इस साइट पर एक लेखक हूं, मुझे विभिन्न शैलियों और विषयों पर लिखना पसंद है। मुझे ऐसा निबंध और ब्लॉग लिखना अच्छा लगता...
Follow:
Published: 17/09/2025
276 लोगों ने देखा
No Comments
शेयर
13 मिनट में पढ़ें

मौलाना हसरत मोहानी भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन अनसुने नायकों में से एक हैं, जिन्होंने अपनी शायरी, राजनीति और क्रांतिकारी विचारों से ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी। इस लेख में हम मौलाना हसरत मोहानी की जीवनी, उनकी पूर्ण स्वराज की मांग और भगत सिंह से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों पर चर्चा करेंगे।

हाईलाइट्स
  • एक अज़ीम शख्सियत, एक इंकलाबी दास्तान
  • इंकलाब ज़िंदाबाद: एक नारा, एक परचम ✊🇮🇳
  • पूर्ण स्वराज: एक दूरदर्शी मांग, जो आठ साल बाद सच हुई 🌅
  • इत्तेहाद की जंग और भारत का विभाजन 💔
  • अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) ❓
  • एक विरासत जो हमेशा ज़िंदा रहेगी 🌟

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास सिर्फ़ बलिदान और संघर्ष की दास्तान नहीं है, बल्कि यह उन अज़ीम शख्सियतों की कहानी भी है, जिन्होंने अपनी कलम, अपने विचारों और अपनी बेबाक ज़ुबान से ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें हिला दीं। ऐसी ही एक शख्सियत थे मौलाना हसरत मोहानी, जिनका नाम भले ही आज इतिहास के पन्नों में कहीं गुमनाम सा लगे, लेकिन उनका दिया ‘इंकलाब ज़िंदाबाद‘ का नारा आज भी हर हिंदुस्तानी की रगों में जोश भर देता है। वे सिर्फ़ एक शायर ही नहीं, बल्कि एक सियासी रहनुमा, पत्रकार और एक ऐसे इंकलाबी थे, जिनकी सोच अपने समय से बहुत आगे थी। उनका जीवन, उनकी शायरी और उनके सियासी क़दम, सभी हमें एक ऐसे नायक की दास्तान सुनाते हैं, जिन्होंने अपनी शर्तों पर आज़ादी की जंग लड़ी।

एक अज़ीम शख्सियत, एक इंकलाबी दास्तान

मौलाना हसरत मोहानी का जन्म 1 जनवरी 1875 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के कस्बा मोहान में हुआ था। उनका वास्तविक नाम सैयद फ़ज़ल-उल-हसन था। ‘हसरत’ उनका तख़ल्लुस यानी शायरी के लिए इस्तेमाल होने वाला उपनाम था, और चूंकि उनका जन्म मोहान में हुआ था, इसलिए उनके नाम के साथ ‘मोहानी’ जुड़ गया और वे हसरत मोहानी के नाम से मशहूर हो गए। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा घर पर ही हासिल की और फिर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (तब एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज) में दाखिला लिया। कॉलेज के दिनों से ही वे क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़ गए और ब्रिटिश हुकूमत की नीतियों के ख़िलाफ़ अपनी बेबाक राय ज़ाहिर करने लगे, जिसके लिए उन्हें 1903 में पहली बार जेल भी जाना पड़ा।

उनका व्यक्तित्व कई पहचानों का एक अनूठा संगम था। वे एक तरफ़ उर्दू अदब के माहिर थे, तो दूसरी तरफ़ एक बेहतरीन सियासतदान और पत्रकार भी। उन्होंने 1903 में अलीगढ़ से ‘उर्दू-ए-मुअल्ला‘ नामक एक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। यह पत्रिका अंग्रेज़ी सरकार के ज़ुल्मों और ग़लत नीतियों के ख़िलाफ़ खुलकर लिखती थी। उनकी कलम की ताक़त से अंग्रेज़ इतने खौफ में थे कि उन्होंने इस पत्रिका को ज़ब्त कर लिया और हसरत मोहानी को कई बार जेल भेजा। ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें तोड़ने के लिए हर संभव कोशिश की, लेकिन वे अपनी ज़िद पर अड़े रहे। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने भी उनके बंदी-जीवन का पूरी तरह से पालन करने की क्षमता की सराहना की थी, यह कहते हुए कि इस श्रेष्ठता में उनकी कोई बराबरी नहीं कर सकता। उनका मानना था कि अंग्रेज़ों की चाकरी करना एक पाप है, और उन्होंने सरकारी लालच को ठुकराकर साहित्य को ही अपनी आजीविका चुना।

इंकलाब ज़िंदाबाद: एक नारा, एक परचम ✊🇮🇳

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का शायद ही कोई ऐसा नारा होगा, जो ‘इंकलाब ज़िंदाबाद‘ जितना लोकप्रिय हुआ हो। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इस शक्तिशाली युद्ध घोष के जनक मौलाना हसरत मोहानी थे। उन्होंने 1921 में अपनी कलम से यह नारा गढ़ा। ‘इंकलाब ज़िंदाबाद‘ का मतलब है ‘क्रांति अमर रहे’ (Long Live The Revolution)। यह नारा उनके दूरदर्शी चिंतन को दर्शाता था, जो सिर्फ़ राजनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक और वैचारिक बदलाव की भी बात करता था।

हालांकि, इस नारे को देशव्यापी पहचान मिली 1929 में, जब युवा क्रांतिकारी भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के बाद इसे पूरी ताकत से बुलंद किया। इस घटना के बाद, यह नारा हर भारतीय क्रांतिकारी के लिए एक पुकार बन गया। यह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का आधिकारिक नारा बन गया और भगत सिंह की शहादत के वक़्त भी उनके लबों पर यही नारा था।

यह दिलचस्प है कि यह नारा कैसे अपनी रचना से एक जन-आंदोलन का प्रतीक बन गया। मौलाना हसरत मोहानी ने एक शायर और पत्रकार के रूप में इसकी कल्पना एक बौद्धिक विचार के तौर पर की थी, लेकिन भगत सिंह जैसे युवा क्रांतिकारियों ने इसे अपने साहसिक कार्यों और बलिदान से एक शक्तिशाली परचम में बदल दिया। इस तरह, एक कलम से जन्मा विचार पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बन गया और आज भी हर विरोध और संघर्ष में यह नारा बुलंद किया जाता है।

पूर्ण स्वराज: एक दूरदर्शी मांग, जो आठ साल बाद सच हुई 🌅

1921 का साल भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ था। उस समय कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन अहमदाबाद में हो रहा था और पार्टी ‘स्वराज’ (ब्रिटिश शासन के भीतर स्व-शासन) की बात कर रही थी। लेकिन मौलाना हसरत मोहानी इस सोच से सहमत नहीं थे। वे कांग्रेस के ‘गरम दल’ से ताल्लुक रखते थे और बाल गंगाधर तिलक को अपना नेता मानते थे। उन्होंने मंच से एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें भारत के लिए ‘पूर्ण स्वराज‘ या ‘आज़ादी-ए-कामिल’ की मांग की गई। यह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इतिहास में पहला मौका था, जब किसी ने आधिकारिक तौर पर पूर्ण स्वतंत्रता की मांग की थी।

हसरत मोहानी की यह बेबाक मांग उस समय कांग्रेस के अधिकांश नेताओं को स्वीकार नहीं थी। महात्मा गांधी समेत कई बड़े नेताओं ने इसे ‘समय से पहले’ और ‘जोखिम भरा’ मानकर खारिज कर दिया। लेकिन हसरत मोहानी अपने विचारों से समझौता नहीं करते थे। उन्होंने कहा था कि “गांधी की तरह बैठ के क्यों काटेंगे चरखा, लेनिन की तरह देंगे दुनिया को हिला हम”। यह उनकी उस दूरअंदेशी सोच को दर्शाता है, जो किसी भी बाहरी सत्ता के वजूद को स्वीकार नहीं कर सकती थी। उनकी यह सोच आठ साल बाद सच हुई। 1929 में कांग्रेस ने लाहौर अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज‘ को अपना आधिकारिक लक्ष्य घोषित किया और 26 जनवरी 1930 को पहली बार ‘पूर्ण स्वराज दिवस’ मनाया गया। हसरत मोहानी का प्रस्ताव भले ही उस समय अस्वीकार कर दिया गया हो, लेकिन इसने कांग्रेस की सोच को बदलने का एक बीज बो दिया, जिसने आगे चलकर आज़ादी की दिशा तय की।

इत्तेहाद की जंग और भारत का विभाजन 💔

मौलाना हसरत मोहानी ने अपनी आख़िरी सांस तक भारत के बंटवारे का पुरज़ोर विरोध किया। वे मुस्लिम लीग के सक्रिय सदस्य थे, लेकिन उन्होंने जिन्ना की नीतियों की खुलकर मुख़ालफ़त की और द्विराष्ट्र सिद्धांत का विरोध किया। उनकी राजनीतिक पहचान बहुत जटिल थी, जिसमें वे अपने संगठन से ज़्यादा अपने विचारों के प्रति वफादार थे। जब उन्हें पाकिस्तान आने का न्योता दिया गया, तो उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यह हिंदुस्तान की धरती ही उनका वतन है और वे यहीं मरना पसंद करेंगे।

आज़ादी के बाद वे संविधान सभा के सदस्य बने। उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ मिलकर भारत के संविधान को लिखने में एक निर्णायक भूमिका निभाई। हालाँकि, उन्होंने कभी भी संविधान पर दस्तखत नहीं किए, क्योंकि वे देश की नई राजनीतिक दिशा से पूरी तरह संतुष्ट नहीं थे। उनका यह क़दम भी उनके सिद्धांतों के प्रति उनकी अटूट निष्ठा को दर्शाता है। वे एक ऐसे सच्चे इंकलाबी थे, जो अपने संगठन से ज़्यादा अपने वतन और अपनी अंतरात्मा के प्रति वफ़ादार थे।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) ❓

प्रश्न: इंकलाब जिंदाबाद का नारा किसने दिया था?

उत्तर: यह नारा मौलाना हसरत मोहानी ने 1921 में अपनी कलम से गढ़ा था। इस नारे का अर्थ है ‘क्रांति अमर रहे’।

प्रश्न: भगत सिंह ने इस नारे को कैसे लोकप्रिय बनाया?

उत्तर: भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 1929 में दिल्ली की सेंट्रल असेंबली में बम फेंकने के बाद इसे पहली बार सार्वजनिक रूप से बुलंद किया। उनके इस साहसिक कार्य और शहादत के बाद यह नारा पूरे देश में फैल गया और क्रांतिकारियों के लिए एक युद्ध घोष बन गया।

प्रश्न: मौलाना हसरत मोहानी ने ‘पूर्ण स्वराज’ की मांग कब की थी?

उत्तर: मौलाना हसरत मोहानी 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में ‘पूर्ण स्वराज‘ या ‘संपूर्ण स्वतंत्रता’ की मांग करने वाले पहले व्यक्ति थे।

प्रश्न: 1921 में कांग्रेस का इस प्रस्ताव पर क्या रुख था?

उत्तर: उस समय कांग्रेस सिर्फ ‘स्वराज’ की बात कर रही थी और महात्मा गांधी सहित अधिकांश नेताओं ने हसरत मोहानी के ‘पूर्ण स्वराज‘ के प्रस्ताव को समय से पहले और जोखिम भरा मानकर खारिज कर दिया था। हालाँकि, 1929 में कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज‘ को अपना आधिकारिक लक्ष्य घोषित कर दिया।

प्रश्न: क्या हसरत मोहानी कृष्ण भक्त थे?

उत्तर: हाँ, मौलाना हसरत मोहानी एक सच्चे कृष्ण भक्त थे। वे हर जन्माष्टमी पर मथुरा जाते थे और पूरी रात कृष्ण की भक्ति में लीन रहते थे। उनकी कई नज़्मों में भी श्रीकृष्ण की भक्ति का ज़िक्र मिलता है।

प्रश्न: ‘उर्दू-ए-मुअल्ला’ पत्रिका का क्या महत्व था?

उत्तर: हसरत मोहानी ने 1903 में इस पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया था। यह पत्रिका अंग्रेज़ी हुकूमत के ज़ुल्मों और नीतियों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती थी, जिसने उन्हें कई बार जेल भिजवाया।

प्रश्न: हसरत मोहानी ने कौन सा प्रसिद्ध शेर जेल में लिखा था?

उत्तर: जेल में चक्की पीसते हुए उन्होंने यह मशहूर शेर लिखा था: “है मश्क़-ए-सुख़न जारी चक्की की मशक़्क़त भी, इक तुर्फ़ा तमाशा है ‘हसरत’ की तबीअत भी”।

प्रश्न: क्या उन्होंने भारत के विभाजन का समर्थन किया था?

उत्तर: नहीं, मौलाना हसरत मोहानी ने अपनी आख़िरी सांस तक भारत के विभाजन का पुरज़ोर विरोध किया था। पाकिस्तान जाने का न्योता ठुकराते हुए उन्होंने कहा था कि हिंदुस्तान ही उनका वतन है।

प्रश्न: क्या वे संविधान सभा के सदस्य थे?

उत्तर: हाँ, हसरत मोहानी संविधान सभा के सदस्य थे और उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के साथ मिलकर संविधान की रूपरेखा तैयार करने में अहम भूमिका निभाई।

प्रश्न: हसरत मोहानी का निधन कब और कहाँ हुआ?

उत्तर: मौलाना हसरत मोहानी का निधन 13 मई 1951 को लखनऊ में हुआ था।


एक विरासत जो हमेशा ज़िंदा रहेगी 🌟

मौलाना हसरत मोहानी का जीवन और व्यक्तित्व हमें सिखाता है कि आज़ादी सिर्फ़ राजनीतिक नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और विचारों की भी होती है। वे एक ऐसे नायक थे, जिनकी ज़िंदगी इंकलाब की दास्तान थी। उनका नारा, उनकी शायरी, उनकी बेबाक मांग और उनकी अनोखी शख्सियत, ये सब मिलकर हमें एक ऐसे भारत की तस्वीर दिखाते हैं, जो विचारों से समृद्ध और एकता से मज़बूत है। हमें गर्व है कि हमारे देश ने ऐसे महान इंकलाबी को जन्म दिया। उनकी विरासत को समझना और उस पर गर्व करना हमारी ज़िम्मेदारी है।

अगर आपको यह लेख पसंद आया, तो इसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ साझा करें ताकि वे भी इस महान शख्सियत के बारे में जान सकें। अपने विचार कमेंट में लिखें और हमें इस तरह के लेखों को लाने के लिए प्रोत्साहित करें। आप हमें डोनेट भी कर सकते हैं।

टैग :मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानी
शेयर करें :
Facebook Pinterest Whatsapp Whatsapp
◈  इस पोस्ट पर अपनी प्रतिक्रिया दें :
Proud3
Happy0
Love1
Surprise0
Sad0
Angry0
एо अहमद
लेखकएо अहमद
Founder and Editor
Follow:
मैं आफताब अहमद इस साइट पर एक लेखक हूं, मुझे विभिन्न शैलियों और विषयों पर लिखना पसंद है। मुझे ऐसा निबंध और ब्लॉग लिखना अच्छा लगता है जो मेरे पाठकों को चिंतन और प्रेरणा देती हैं।
कमेंट करें! कमेंट करें!

कमेंट करें! Cancel reply

You must be logged in to post a comment.

हमें फॉलो करें >>

FacebookLike
XFollow
InstagramFollow
YoutubeSubscribe

सबसे अधिक पढ़ी गईं >>

🌟 इमाम अहमद इब्न हंबल: एक बहादुर योद्धा की कहानी जिसने इल्म और ईमान की मिसाल कायम की

20 मिनट में पढ़ें
289 लोगों ने देखा

डॉ. ज़ाकिर हुसैन: भारत के पहले मुस्लिम राष्ट्रपति की प्रेरणादायक कहानी

12 मिनट में पढ़ें
269 लोगों ने देखा

नासिर अहमद: वह शख्स जिसने आपकी डिजिटल दुनिया बदल दी!

10 मिनट में पढ़ें
82 लोगों ने देखा
8 Islamic Principles for Successful Business, in the Light of the Holy Quran and Hadith

सफल व्यापार के लिए 8 इस्लामी सिद्धांत, पवित्र कुरान और हदीस की रोशनी में

9 मिनट में पढ़ें
641 लोगों ने देखा

अहमद कथराडा: दक्षिण अफ्रीका के रंगभेद विरोधी आंदोलन के भारतीय मूल के नायक

14 मिनट में पढ़ें
29 लोगों ने देखा

मौलाना शाह अब्दुल कादिर लुधियानवी: 1857 की जंग-ए-आजादी के गुमनाम नायक

12 मिनट में पढ़ें
289 लोगों ने देखा

इमाम अल-बुखारी: इस्लामिक विद्वान और हदीस संकलनकर्ता

29 मिनट में पढ़ें
98 लोगों ने देखा

अल-इद्रीसी: मध्यकालीन विश्व का महान भूगोलवेत्ता और उनकी रोमांचक कहानियां

12 मिनट में पढ़ें
175 लोगों ने देखा

मौलाना अबुल आला मौदुदी: किताबों की ताकत से इस्लाम की सच्चाई को दुनिया तक पहुंचाने वाला शख्स

12 मिनट में पढ़ें
362 लोगों ने देखा

इमाम मुस्लिम: सहीह मुस्लिम के संकलनकर्ता

14 मिनट में पढ़ें
258 लोगों ने देखा
Avatar
Daily Hadith
Today at 12:00 PM

सम्बंधित टॉपिक >>

मौलाना हिफ्ज़ुर रहमान स्योहारवी: आज़ादी का एक सितारा, एकता का पैगाम

9 मिनट में पढ़ें
64 लोगों ने देखा

भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 के एक वीर नायक बख्शी गुलाम मोइनुद्दीन खान

7 मिनट में पढ़ें
1.9k लोगों ने देखा

1857 का विद्रोह: मौलवी अहमदुल्ला शाह जिन्होंने अंग्रेजों को भगाकर 1 साल तक किया अवध क्षेत्र पर हुकूमत।

4 मिनट में पढ़ें
102 लोगों ने देखा
Aruna Asaf Ali.

स्वतंत्रता संग्राम की ज्वाला भड़काने वाली अरुणा आसफ अली

12 मिनट में पढ़ें
22 लोगों ने देखा

महत्वपूर्ण लिंक्स

  • सहेजी गई पोस्ट
  • आपके लिए
  • पढ़े गए पोस्ट
  • पसंदीदा टॉपिक्स
  • मेरी प्रोफाइल
  • हमारे बारे में
  • हमारी सहायता करें
  • हमे विज्ञापन दें
  • भविष्य योजना
  • साइट के लेखक
  • संपर्क करें
  • गोपनीयता नीति
  • अस्वीकरण
  • सेवा की शर्तें
  • सुधार नीति

All content © NoorPost


News Video
Quiz
Tools
More

Quiz Categories

General Knowledge Test IQ Islamic Quiz Science History Fun Quiz

Tools & Utilities

Age Calc Converter QR Gen BMI Calc Search Love Calc Wishes

Explore More

About Us Donate Us Privacy Terms Contact Advertise Correction Disclaimer Future Plan Writers
adbanner
Welcome Back!

Sign in to your account

Username or Email Address
Password

क्या पासवर्ड भूल गए?

Not a member? Sign Up